टैबलेट या इंसुलिन ?
टैबलेट या इंसुलिन ?
वर्ल्ड डायबीटीज डे ?
शुगर को न बहुत गंभीरता से लें और न हल्के में। यह बीमारी नहीं, परेशानी है जिसे मैनेज करके सही रखा जा सकता है। जो जितनी सहजता से मैनेज कर ले, वह उतना सफल है। कई चीजें खुद ही करनी होती हैं और कुछ मदद बाहर से लेनी होती है। इनमें टैबलेट और इंसुलिन का नाम अहम है। कब टैबलेट लें और कब इंसुलिन जरूरी है? बता रहे हैं।
लोकेश के. भारती
जब शुगर बेकाबू हो तो पलूशन का असर शरीर पर ज्यादा होता है क्योंकि शरीर के भीतर इन्फ्लेमेशन भी बढ़ा रहता है। नतीजा एलर्जी की परेशानी भी काफी बढ़ जाती है।
शुगर काबू करने में दोनों का होता है इस्तेमाल
हम जो भी खाते हैं, उसे शरीर ग्लूकोज के रूप में ही उपयोग करता है। ग्लूकोज का उपयोग करने के लिए इंसुलिन हॉर्मोन की जरूरत होती है, जिसे पैनक्रिआस (बीटा) बनाता है। लेकिन जब मोटापे, गलत लाइफस्टाइल, फैमिली हिस्ट्री, फिजिकल ऐक्टिविटी से दूरी आदि की वजह से पैनक्रिआस डिमांड के हिसाब से इंसुलिन नहीं पैदा कर पाता तो खून में शुगर का स्तर बढ़ने लगता है। यही डायबीटीज की स्थिति होती है। लगातार शुगर बढ़े रहने से इसका असर शरीर के तमाम अंगों और यहां तक कि कोशिकाओं पर पड़ता है। इसलिए इसे काबू में रखना जरूरी है। खुद की कोशिश से और दवाओं की मदद से।
ये उपाय नहीं होने देंगे शुगर, हो जाए तो रखेंगे काबू में
वज़न, स्ट्रेस और लाइफस्टाइल हो सही
अगर वजन बढ़ा हुआ है तो शुगर को काबू करना मुश्किल है। एक्सरसाइज, योग आदि को जिंदगी का हिस्सा बनाने से काफी फायदा होता है। दरअसल, मांसपेशियों के मजबूत होने से शुगर का खतरा कम हो जाता है। शरीर में ग्लुकोज का इस्तेमाल 2 जगहों पर होता है- बड़ी मांसपेशियों में और लिवर में।
मांसपेशियां तभी ग्लूकोज का भरपूर इस्तेमाल कर पाती है, जब वे मजबूत हों। कमजोर मांसपेशिया अपने हिस्से का ग्लूकोज भी लिवर को भेज देती हैं। इससे लिवर को एक्स्ट्रा ग्लूकोज को भी खपाना होता है। ऐसा न होने पर शरीर पहले उसे फैट के रूप में स्टोर करता है यानी फैटी लिवर। इससे भी ज्यादा होने पर खून में छोड़ देता है तो कलेस्ट्रॉल में बढ़ जाता है। ज्यादा होने पर खून की नलियों में चीं जमा होने लगती है तो हाई बीपी हो जाता है। हर दिन ब्रिस्क वॉक और एक्सरसाइज, योग करने के लिए कहा जाता है। 6 से 8 घंटे की नींद पूरी करने से भी काफी फर्क पड़ता है। वैसे तो स्ट्रेस की वजह से सीधे तौर पर शुगर नहीं बढ़ता, लेकिन यह दूसरी कई वजहें जरूर पैदा करता है। हॉर्मोन की गड़बड़ियां, नीद खराब आदि।
डाइट पर ध्यान दें
खानपान में मीठा कार्बोहाइड्रेट्स (चावल, रोटी आदि), फैटी चीजों को कम करके। साथ में सलाद, फल यानी फाइबर वाली चीजें ज्यादा खाकर।
दवाओं से करें काबू
अगर इन उपायों से शुगर काबू में आ जाए तो मुमकिन है टैबलेट या इंसुलिन लेने की जरूरत ही न पड़े। अमूमन ऐसा कम होता है। डॉक्टर बाकी उपायों के साथ गोलियां या इंसुलिन भी लिख देते हैं।
टैबलेट हो या इंसुलिन, मकसद है शुगर कंट्रोल करना
यह समझना जरूरी है कि टैबलेट पेनक्रिआस को ज्यादा मात्रा में इंसुलिन उत्पादन करने के लिए प्रेरित करता है. न कि टैबलेट में इसुलिन होती है। वहीं, सुई के माध्यम से इंसुलिन सीधे खून में पहुंचती है। टैबलेट को इसलिए पसंद किया जाता है क्योंकि इसे लेने में परेशानी नहीं होती, लेकिन इंसुलिन में सुई लगानी होती है। दूसरी वजह यह भी है कि जब कोई शख्स यह सुनता है कि इंसुलिन लगाने के लिए कहा जा रहा है तो उसे लगता है कि अब सब खत्म। पर ऐसा नहीं है। असल मकसद है शुगर को काबू करना।
तब मान लें कि हो चुके हैं डायबीटिक
सामान्य टेस्ट
खाली पेट (फास्टिंग) और नाश्ता या ग्लूकोज लेने के बाद (पीपी)।
फास्टिंग ब्लड शुगर (नॉर्मल) 70-100 mg/dl
ध्यान दें। रात को खाना खाने के बाद 12 घंटे की फास्टिंग हो। रात 8 बजे कुछ खाया है ती अगले दिन सुबह 8 बजे से पहले टेस्ट न कराए। शुगर 100 से ऊपर और 110-115 से कम आए तो पी-डायबीटिक स्टेज है। इससे ऊपर आ रही है तो शुगर की चपेट में आ गए हैं।
पोस्ट प्रैडियल (PP) शुगर 70-140 mg/dl
ध्यान दें। खाने का पहला कौर खाने के 2 घंटे बाद टेस्ट किया जाता है। टाइम की कैलकुलेशन पहली बाइट से हो जाती है। इसमें अगर शुगर का स्तर 150-160 तक जात है तो पी-डायबीटिक स्टेज है। अगर इससे ऊपर चला गया तो इसकी चपेट में आ गए है।
HDA1C टेस्ट
इसे हीमोग्लोबिन A1C या ऐवरेज ब्लड शुगर टेस्ट भी कहते है। इस टेस्ट से पिछले 3 महीने के ऐवरेज ब्लड शुगर लेवल का पता लग जाता है। इसमें खाली पेट और खाने के 2 घंटे बाद का ब्लड सैंपल देना नहीं पड़ता। कभी भी. किसी भी लैब में जाकर HbA1c (ग्लाइकोरिरलेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट के लिए सिर्फ एक सैंपल वे सकते हैं।
5.7 से कम: नॉर्मल
5.7 से 6.4: प्री-डायबीटिक
6.5 या ज्यादा डायबीटिक
कब इंसुलिन ज़रूर शुरू कर दें?
इंसुलिन की जरूरत जब ज्यादा पड़ती है जब HBAIC (शुगर की 3 महीने की औसत रिपोर्ट) रिपोर्ट 8 से ज्यादा दिखाए। अगर टैबलेट के माध्यम से यह 7 या 7.5 तक दिखे तो मुमकिन है दूसरे अंगों पर असर पड़ने में काफी वक्त लग जाए। लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी अगर शुगर का स्तर 8 से ज्यादा बना हुआ है तो काबू करना सबसे जरूरी है। ऐसे में इसुलिन ही उपाय है। इसुलिन स्किन में (सब क्यूटेनियस) ली जाती है। एक पतली-सी नीडल होती है। उसी से इंसुलिन शरीर में पहुंचती है। वैसे इसुलिन पैच मी आ गए है। इसमें हर दिन सुई नही लगानी होती है।
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टाइप-1 डायबीटीज़
इसमें टैबलेट से काम नहीं चलता। शुरुआत से ही इंसुलिन लेना ही उपाय है। दरअसल, बचपन में अचानक इंसुलिन हॉर्मोन बनना बिलकुल बंद होने की वजह से इस तरह की परेशानी होती है। हर मील के बाद या हर दिन शरीर में बड़े हुए ग्लूकोज को काबू करने के लिए बाहर से इसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत होती है।
..तब टाइप-2 डायबीटीज़
जब पेट के पास चर्बी जमा होने लगती है। साथ ही कलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड बढ़ने लगता है। फैमिली हिस्ट्री भी हो तो इसुलिन की सेंसिटिविटी जल्दी कम होती जाती है। यही स्थिति 'इसुलिन रेजिस्टेस' की बनती है। इससे शुगर जज्ब करने के लिए ज्यादा मात्रा में इंसुलिन की जरूरत पड़ती है। ऐसे में पेनकि आस को ज्यादा मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन करना पड़ता है। आखिरकार पेनक्रिआस के लिए इंसुलिन की पूर्ति करना मुमकिन नहीं हो पाता। फिर शरीर को बाहर से दवा की जरूरत होती है। यही स्थिति टाइप-2 डायबीटीज की होती है। शुरुआत में टैबलेट से काम चल जाता है और बाद में काबू न होने पर इसुलिन की जरूरत पड़ती है।
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