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Showing posts from November, 2025

स्यूसाइड कोई तुरंत उठाया गया कदम नहीं

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स्यूसाइड कोई तुरंत उठाया गया कदम नहीं, इससे पहले कई रेड फ्लैग नज़र आते हैं, जिन्हें पहचानना है जरूरी क्या आपका बच्चा उदास है? देखना होगा ये 10 लक्षण तो नहीं 10वीं के स्टूडेंट के ने बच्चों की मेंटल हेल्थ पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसलिए पैरंट्स के साथ-साथ ये जरूरी है कि स्कूल में टीचर्स भी उनकी मनोस्थिति के बारे में जाने कि बच्चा किस दौर से होकर गुजर रहा है। हमारे लिए यह कहना आसान है कि मेरा पैर टूटा है मगर यह कहना कठिन है कि मेरा मन उदास है या मुझे घबराहट हो रही है, यह समझना जरूरी है। साइकॉलजी एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर हम अपनी खराब मेंटल हेल्थ को बयां करते हैं तो दूसरे को लगता है कि यह कमजोरी की निशानी है या यह बात करना वक्त की बर्बादी है, इसी वजह से बच्चे भी खुलकर अपनी बातें बता नहीं पाते। क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट डॉ मोनिका कुमार कहती हैं, मेंटल हेल्थ को एक सामान्य भाषा देनी जरूरी है। इसके लिए स्कूलों में काउंसलिंग, अस्पतालों क्लिनिक में काउंसलिंग की सुविधा जरूरी है और यह सुविधा है तो यह देखना भी जरूरी है कि कितनी बेहतर तरीके से चल रही है। स्कूल में काउंसलर है, मगर उस तक बच्चा ...

स्वर चिकित्सा

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स्वर चिकित्सा क्या आप जानते है ? हमारी सांसे ही हमारे स्वास्थ्य का रहस्य है ! आयुर्वेद में एक अद्भुत विद्या बताई गई है - स्वर चिकित्सा । भगवान शिव ने इस ज्ञान को " शिव स्वरोदय " ग्रन्थ में बताया है। स्वर चिकित्सा कैसे काम करती है? इस विधा में यह देखा जाता है कि कौनसी नाड़ी ( स्वर) सक्रिय है : * चंद्र स्वर (बायां) इड़ा नाडी शांति, ठंडक ओर मानसिक शांति देती है। * सूर्य स्वर (दाया) पिंगला नाडी ऊर्जा, गर्मी और कर्म शक्ति देती है। * सुषमना स्वर (दोनों) स्वर चलते है ध्यान, समाधि और आत्मिक अनुभव से जुड़ी है। हर समय हमारी सांस एक नासिका से ज्यादा चलती है - यही स्वर कहलाता है। इन स्वरों के ज्ञान से शरीर की बीमारियों का निदान और इलाज किया जाता है। स्वस्थ मनुष्य के स्वर, प्रकृति के द्वारा निश्चित नियमों के अनुसार चला करते है जैसे .... प्रत्येक मास में दो पक्ष होते है - 1 पंद्रह दिन का शुक्ल पक्ष (चांदनी पक्ष) 2 पंद्रह दिन का कृष्ण पक्ष (अंधेरा पक्ष) स्वर शास्त्र के अनुसार साधारणतः नियम यह है कि पप्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पड़वा या पहली तिथि) से लगाता...

टैबलेट या इंसुलिन ?

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टैबलेट या इंसुलिन ? वर्ल्ड डायबीटीज डे  ? शुगर को न बहुत गंभीरता से लें और न हल्के में। यह बीमारी नहीं, परेशानी है जिसे मैनेज करके सही रखा जा सकता है। जो जितनी सहजता से मैनेज कर ले, वह उतना सफल है। कई चीजें खुद ही करनी होती हैं और कुछ मदद बाहर से लेनी होती है। इनमें टैबलेट और इंसुलिन का नाम अहम है। कब टैबलेट लें और कब इंसुलिन जरूरी है? बता रहे हैं। लोकेश के. भारती जब शुगर बेकाबू हो तो पलूशन का असर शरीर पर ज्यादा होता है क्योंकि शरीर के भीतर इन्फ्लेमेशन भी बढ़ा रहता है। नतीजा एलर्जी की परेशानी भी काफी बढ़ जाती है। शुगर काबू करने में दोनों का होता है इस्तेमाल हम जो भी खाते हैं, उसे शरीर ग्लूकोज के रूप में ही उपयोग करता है। ग्लूकोज का उपयोग करने के लिए इंसुलिन हॉर्मोन की जरूरत होती है, जिसे पैनक्रिआस (बीटा) बनाता है। लेकिन जब मोटापे, गलत लाइफस्टाइल, फैमिली हिस्ट्री, फिजिकल ऐक्टिविटी से दूरी आदि की वजह से पैनक्रिआस डिमांड के हिसाब से इंसुलिन नहीं पैदा कर पाता तो खून में शुगर का स्तर बढ़ने लगता है। यही डायबीटीज की स्थिति होती है। लगातार शुगर बढ़े रहने से इसका असर शरीर के तमा...