स्वर चिकित्सा
स्वर चिकित्सा
क्या आप जानते है ? हमारी सांसे ही हमारे स्वास्थ्य का रहस्य है ! आयुर्वेद में एक अद्भुत विद्या बताई गई है - स्वर चिकित्सा ।
भगवान शिव ने इस ज्ञान को "शिव स्वरोदय" ग्रन्थ में बताया है।
स्वर चिकित्सा कैसे काम करती है?
इस विधा में यह देखा जाता है कि कौनसी नाड़ी ( स्वर) सक्रिय है :
* चंद्र स्वर (बायां) इड़ा नाडी शांति, ठंडक ओर मानसिक शांति देती है।
* सूर्य स्वर (दाया) पिंगला नाडी ऊर्जा, गर्मी और कर्म शक्ति देती है।
* सुषमना स्वर (दोनों) स्वर चलते है ध्यान, समाधि और आत्मिक अनुभव से जुड़ी है।
हर समय हमारी सांस एक नासिका से ज्यादा चलती है - यही स्वर कहलाता है।
स्वस्थ मनुष्य के स्वर, प्रकृति के द्वारा निश्चित नियमों के अनुसार चला करते है जैसे ....
प्रत्येक मास में दो पक्ष होते है -
1 पंद्रह दिन का शुक्ल पक्ष (चांदनी पक्ष)
2 पंद्रह दिन का कृष्ण पक्ष (अंधेरा पक्ष)
स्वर शास्त्र के अनुसार साधारणतः नियम यह है कि पप्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पड़वा या पहली तिथि) से लगातार तीन दिन (एकम, दूज, तीज) तक प्रातः मनुष्य की नींद खुलने पर सूर्योदय के समय, पहले बाई नथुने से सांस अर्थात चन्द्र स्वर चला करता है
तथा
कृष्ण पक्ष के पहले दिन से लगातार तीन दिन तक प्रातः सोकर उठने पर सूर्योदय के समय मनुष्य का दाया या सूर्य स्वर चला करता है।
यही स्वर का प्राकृतिक नियम है, परन्तु यदि प्रतिपदा (पड़वा) के दिन, सूर्योदय के समय, स्वर परीक्षा करने पर आपका स्वर इस नियम के विपरीत चलता जन पड़े तो उस पक्ष में आपको शारीरिक रोग या मानसिक गड़बड़ी या अमंगल का सामना करना पड़ेगा ।
ऐसी स्थिति में स्वर - परिवर्तन की किसी विधि का सहारा लेकर स्वर को नियमित करके आप बीमारी की स्थिति से बच सकते 370 है
सूर्य स्वर (दाया नथुना चालू हो)
इसे पिंगला नाडी या सूर्य स्वर कहते है।
यह गर्म, सक्रिय और कर्म प्रधान कार्यों के लिए शुभहोती है।
सूर्य स्वर में करने योग्य कार्य:
व्यापार, सौदा या कोई नया काम शुरू करना
कठिन निर्णय लेना
बहस, प्रतियोगिता, मीटिंग
यात्रा आरम्भ पूर्व दिशा या दक्षिण दिशा में करे
शारीरिक परिश्रम या व्यायाम
गर्म भोजन करना या स्नान करना
सूर्य स्वर में न करे:
पूजा, ध्यान या मानसिक कार्य
भावनात्मक बातें या विवाद सुलझाना
संस्कृत श्लोक (Sanskrit Shloka)
"भोजनात् पूर्वं संचाल्य, सूर्यनाड़ीं प्रयत्नतः।
दीप्ताग्निः पचते भुक्तं, स्वास्थ्यं पूर्णं प्रयच्छति॥"
हिंदी अर्थ:
भोजन करने से पूर्व प्रयत्नपूर्वक सूर्य नाड़ी (दाहिनी नाक) को संचालित (सक्रिय) करना चाहिए। इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है, जो खाये हुए भोजन को भली-भांति पचाती है और पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करती है।
: बेहतर पाचन के लिए स्वर विज्ञान (Surya Swara)
Title: पाचन शक्ति और आरोग्य का रहस्य: सूर्य स्वर 🌞
क्या आप जानते हैं कि भोजन को सही ढंग से पचाने में हमारे भोजन की गुणवत्ता के साथ-साथ हमारी श्वास (Breath) का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है? स्वर विज्ञान के अनुसार, 'सूर्य स्वर' का सही उपयोग पाचन क्रिया को सुदृढ़ बना सकता है।
🔥 सूर्य स्वर का महत्व
हमारी दाहिनी नासिका (Right Nostril) को 'सूर्य स्वर' कहा जाता है। यह शरीर में ऊष्मा (Heat) और ऊर्जा का प्रतीक है। जब सूर्य स्वर चलता है, तो शरीर की 'जठराग्नि' (Digestive Fire) सक्रिय हो जाती है, जो भोजन को ऊर्जा में बदलने के लिए अनिवार्य है।
✅ प्रयोग की विधि (Steps to Follow):
भोजन से पूर्व (Before Eating): भोजन ग्रहण करने से 10-15 मिनट पहले यह सुनिश्चित करें कि आपका सूर्य स्वर (Right Nostril) सक्रिय हो। यदि बायाँ स्वर चल रहा हो, तो थोड़ी देर के लिए बाईं करवट (Left side) लेट जाएं या बायाँ नथुना बंद करके दाएँ से सांस लें। इससे पाचन अग्नि भोजन के लिए तैयार हो जाती है।
भोजन के समय: भोजन करते समय सूर्य स्वर का चलना अत्यंत लाभकारी माना गया है।
भोजन के पश्चात (After Eating): भोजन के बाद 'वज्रासन' में बैठें या 10-15 मिनट के लिए 'वामकुक्षी' (बाईं करवट) लेटें। इससे सूर्य स्वर प्राकृतिक रूप से सक्रिय रहता है और पाचन प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती है।
इस प्राचीन विज्ञान को अपनी दिनचर्या में शामिल करें और स्वस्थ जीवन की ओर कदम
चंद्र स्वर (बायां नथुना चालू हो)
इसे इड़ा नाडी या चंद्र नाडी भी कहते है । यह शीतल, शांत और मानसिक कार्यों के लिए शुभ मानी जाती है।
चंद्र स्वर में करने योग्य कार्य:
1. ध्यान, पूजा, जप, साधना
2. अध्ययन, लेखन, संगीत, चित्रकला
3. भावनात्मक या सॉफ्ट बातचीत
4. दया, परम और सेवा के कार्य
5. नए रिश्ते, मित्रता की शुरुआत
6. पौधे लगाना, पानी देना
7. यात्रा का आरंभ उत्तर दिशा या पश्चिम दिशा में करे ।
चंद्र स्वर में न करे:
1. भारी काम, लड़ाई - झगड़ा वाद - विवाद
2. कोई शारीरिक या सक्रिय कार्य
3. दक्षिण दिशा में यात्रा की शुरुआत
चंद्रः सम्पदेः कार्यं रविस्तु विपदेः सदा।
पूर्ण पादे पुरस्कृत्य यात्रा भवति सिद्धिदा॥
इस श्लोक का सीधा-सा भाव यह है कि
हर काम का सही समय और सही तरीका होता है, और वह शरीर में चल रही नाड़ी (स्वर) से जुड़ा होता है।
1️⃣ चंद्र स्वर (बाईं नाड़ी) क्या बताता है?
जब बाईं नाक से सांस ज़्यादा चल रही हो, उसे चंद्र स्वर कहते हैं
यह स्वर जुड़ा होता है:
शांति
वृद्धि
धन, सुख, सफलता
शुभ कार्यों से
👉 इसलिए श्लोक कहता है:
“चंद्रः सम्पदेः कार्यं”
यानि जब चंद्र स्वर चल रहा हो, तब सम्पत्ति, लाभ और शुभ कार्य करने चाहिए।
2️⃣ सूर्य स्वर (दाईं नाड़ी) का अर्थ
जब दाईं नाक से सांस चल रही हो, वह सूर्य स्वर है
यह जुड़ा होता है:
संघर्ष
बाधा
कठिन परिस्थितियाँ
विरोध
👉 इसलिए कहा गया:
“रविस्तु विपदेः सदा”
अर्थात सूर्य स्वर विपत्ति, टकराव या मजबूरी वाले कामों में चलता है।
3️⃣ पैर आगे रखने का नियम क्यों बताया गया?
यह सिर्फ़ चलने की बात नहीं है, बल्कि शरीर की ऊर्जा को संतुलन में लाने की विधि है।
🌙 चंद्र स्वर चल रहा हो
→ बाँया पैर 4 बार आगे रखकर चलना
→ इससे चंद्र ऊर्जा और स्थिर होती है
→ मन शांत रहता है, काम सहज बनते हैं
☀️ सूर्य स्वर चल रहा हो
→ दाहिना पैर 5 बार आगे रखकर चलना
→ इससे सूर्य की तीव्र ऊर्जा संतुलित होती है
→ बाधाएँ कम होती हैं
4️⃣ “तीनों लोकों में सिद्धि” का भावार्थ
यहाँ तीन लोक का मतलब केवल स्वर्ग-पाताल नहीं है।
इसका संकेत है:
शरीर (स्वास्थ्य)
मन (निर्णय और आत्मविश्वास)
परिस्थिति (बाहरी दुनिया)
जब स्वर के अनुसार चलना होता है, तो
तीनों जगह सामंजस्य बन जाता है —
और काम सिद्ध होने लगते हैं।
सुषुम्ना स्वर (दोनों नथुने समान रूप से चले)
यह बहुत दुर्लभ होता है यह तब होता है जब मन शांत और पूरी तरह से केंद्रित हो ।
सुषुम्ना स्वर में करने योग्य कार्य :
ध्यान, जप, योग, साधना, मौन
किसी आध्यात्मिक कार्य का आरंभ
भगवान का स्मरण या आत्म चिंतन
सुषुम्ना स्वर में न करे :-
सांसारिक या व्यापारिक कार्य
यात्रा या नया कार्य आरंभ
स्वर चिकित्सा"
(सांसों से उपचार की अद्भुत विद्या)
क्या आप जानते है ? हमारी सांसे ही हमारे स्वास्थ्य का रहस्य है ! आयुर्वेद में एक अद्भुत विद्या बताई गई है - स्वर चिकित्सा ।
भगवान शिव ने इस ज्ञान को "शिव स्वरोदय" ग्रन्थ में बताया है।
स्वर चिकित्सा कैसे काम करती है?
इस विधा में यह देखा जाता है कि कौनसी नाड़ी ( स्वर) सक्रिय है :
* चंद्र स्वर (बायां) इड़ा नाडी शांति, ठंडक ओर मानसिक शांति देती है।
* सूर्य स्वर (दाया) पिंगला नाडी ऊर्जा, गर्मी और कर्म शक्ति देती है।
*सुषमना स्वर (दोनों) स्वर चलते है ध्यान, समाधि और आत्मिक अनुभव से जुड़ी है।
हर समय हमारी सांस एक नासिका से ज्यादा चलती है - यही स्वर कहलाता है।
इन स्वरों के ज्ञान से शरीर की बीमारियों का निदान और इलाज किया जाता है।
स्वर विज्ञान के अनुसार हम स्वर को बदलकर स्वस्थ रह सकते है।
स्वस्थ मनुष्य के स्वर, प्रकृति के द्वारा निश्चित नियमों के अनुसार चला करते है जैसे..
1. शुक्ल पक्ष या चांदनी पक्ष में 1-2-3,7-8-9,13-14-15 इन तिथियों में सूर्योदय या शय्या त्याग के समय बाएं नथुने से सांस अर्थात बायां स्वर चलना चाहिए
और
इसी प्रकार 4-5-6, 10-11-13, इन छः तिथियों में दाएं नथुने से सांस अर्थात दाया स्वर चलना चाहि
2. कृष्ण पक्ष में 1-2-3, 7-8-9, 13-14-15 इन तिथियों में सूर्योदय के समय दाया स्वर
और
इसी प्रकार 4-5-6,10-11-12 इन तिथियों में बायां स्वर चलना चाहिए ।
स्वर बदलने की विधि :-
1. जिस तरफ के नथुने से सांस चल रही हो, केवल उसी तरफ के करवट पर कुछ देर लेटे रहने से स्वर बदल जाता है
2. यदि दाहिनी करवट लेटने के बाद कुछ देर दाहिने नथुने को अंगूठे या अंगुली से दबाकर बाएं स्वर से लगातार श्वास - क्रिया चालू रखें तो बायां स्वर शीघ्र चल पड़ेगा ।
3. चालू स्वर वाले नथुने से भरपूर श्वास ग्रहण करके बंद नथुने से बार - बार श्वास छोड़ने से बंद स्वर चालू हो जाता है।
4. जिस तरफ का स्वर बंद करना हो, उस तरफ की बगल में या फेफड़ों पर दवाब दे तो स्वर बदल जाता है।
स्वर चिकित्सा
भोजन और स्वर - ज्ञान
दाहिने स्वर भोजन करें, बाएं पीवे नीर,
ऐसा संयम जब करें, सुखी रहें शरीर।
बाएं स्वर भोजन करें, दाहिने पीवे नीर,
दस दिन भुला यो करे, पांवे रोग शरीर।
इस कहावत के अनुसार भोजन तभी सेवन करना चाहिए, जब दाहिना स्वर चल रहा हो। जल पीते समय नासिका का बायां स्वर चलना चाहिए। इस प्रकार संयम करने से शरीर सुखी रहा। है। इसके विपरीत आचरण करने से काया रोगी बनती है
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