जल ही जीवन है
जल ही जीवन है
शास्त्रों का कथन है :
"अग्नीषोमात्मकम् जगत्।"
अर्थात् यह जगत् अग्नि और सोम का संघात (Mixture) है। संसार में सब कुछ इनके सम्मिश्रण से बना है।
तैत्तिरीय उपनिषद् (2.1) का कथन है :
" वायोरग्नि:। अग्नेराप:। अद्भभ्य: पृथिवी।"
अर्थात् वायु से अग्नि की, अग्नि से जल की और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।
हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि पृथ्वी का 72% हिस्सा पानी से घिरा हुआ है। जीवविज्ञान के अनुसार, हमारे शरीर में पानी का अनुपात भी लगभग इतना ही है।
जल जीवन का प्रतीक है। यह सर्वविदित है कि विश्व की सभी संस्कृतियाँ नदियों के तट पर ही पनपी हैं। वैज्ञानिक पृथ्वी-इतर जीवन (Extraterrestrial Life) की खोज में, दूसरे ग्रहों पर जल की उपलब्धता को सर्वोपरि मान रहे हैं।
जीवन का आधार तीन तत्त्व हैं -- वायु, जल और अन्न। प्राणायाम से वायु की आपूर्ति की जाती है जिसका वर्णन हमने पूर्व लेखों में किया है। जल से जीवन को कैसे समृद्ध बनाया जा सकता है, इसका वर्णन आगे किया जाएगा ।
अन्न का महत्त्व सभी जानते हैं। इस स्थूल शरीर को "अन्नमय कोश" कहा जाता है। कहावत है : जैसा अन्न, वैसा मन। छल, कपट, बेईमानी से कमाया धन/अन्न, मन में विकार और शरीर में बीमारियां उत्पन्न करता है।
अन्न के विषय में उपदेश है कि मनुष्य को " मित भोगी " ( कम खाना ), " ऋतभोगी" (ऋतु के अनुसार खाना) और " हित भोगी" (हितकारी/पौष्टिक आहार खाने वाला; मांस- मदिरा से परहेज़ करने वाला) होना चाहिए।
भोजन के उपरान्त शरीर की अवस्था का वर्णन योगरत्नाकर में इस प्रकार किया गया है :
भुक्तवोपविशतस्तन्द्रा शयानस्य तु पुष्टता।
आयुश्चंक्रममाणस्य मृत्युर्धावति धावत:।।
अर्थात् भोजन के बाद बैठने वाले को तन्द्रा ( झपकी / Nap, Dozing off ) आती है; (अन्न में मादकता/ नशा है, इसलिए खाने के बाद एक घंटे तक गाड़ी नहीं चलानी चाहिए); (बांई ओर) लेटने वाले को पुष्टता मिलती है; चहल- कदमी वाले की आयु बढ़ती है; दौड़ने वाला मृत्यु/ रोगग्रस्त होता है।
प्राण का जल से सम्बन्ध को छान्दोग्य उपनिषद् (6.7.1) में इस प्रकार समझाया गया है :
षोडशकल: सौम्य पुरुष: पञ्चदशाहानि माsशी:
काममपः पिबामोमय: प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ।।
अर्थात् हे वत्स! यह पुरुष सोलह कलाओं (अंशों) वाला है। अगर तुम पन्द्रह दिन तक खाना न खाओ, किन्तु पानी यथेच्छा पीते रहो ; तो जल पीते रहने के कारण प्राण नहीं टूटेगा-- प्राण जलमय जो है।
ऋग्वेद और अथर्ववेद में जल को औषधीय गुणों से संपन्न कहा गया है। "अप्सु विश्वानि भेषजा।" (अथर्ववेद - 1.6.2) अर्थात् जल में सभी औषधियाँ निहित है। " अप्स्वे१न्तरमृतमपसु भेषजमपामुत प्रशस्तये।"(ऋग्वेद 1.23.19) अर्थात् जल के अन्दर अमृत है; जल में औषधि है; जीवन को प्रशस्त / सुखी/ उत्कृष्ट बनाने के लिए, इसका सेवन करो।
अथर्ववेद (1.6.3) में प्रार्थना है :
"आप: पृणीत भेषज वरूथं तन्वे३ मम।"
अर्थात् हे जलो! अपनी औषधीय शक्तियों से मेरे शरीर में एक कवच उत्पन्न कर दो, ताकि दीर्घ आयु हो सकूं।
( वेद में "आप:" शब्द बहुवचन में प्रयुक्त होता है। जल के साथ-साथ सभी प्रकार के शरीर में उत्पन्न होने वाले रस ( Secretions), फलों व औषधियों के रस जल व सोम से जाने जाते हैं।)
कोरोना महामारी में निम्न ऑक्सीजन ( प्राण वायु ) स्तर एवं डिहाईड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) के गंभीर परिणाम हो सकते हैं । ऑक्सीजन की कमी जहां प्राणायाम से पूरी की जा सकती है, वहां जल ( H20) आक्सीजन और हाइड्रोजन का सम्मिश्रण होने से दोनों समस्याओं के लिए लाभप्रद है।
यहां हम केवल जल चिकित्सा का ही वर्णन करेंगे। सुश्रुत में कहा गया है कि जो व्यक्ति सुबह उठकर पांच अंजलि पानी पीता है, वह 100 वर्ष तक जीता है। ध्यान देने योग्य है कि परिमाण प्राकृतिक है। एक बच्चे और एक व्यस्क की पानी पीने की मात्रा समान नहीं हो सकती।
रात को पानी तांबे के पात्र में रखें और सुबह उस पानी को पिये।
मनुष्य को 1 दिन में कम से कम 2 लीटर पानी पीना चाहिए।
कोरोना काल में गर्म पानी पीने की हिदायत दी जाती है। इससे कोरोना वायरस निष्क्रिय हो जाता है।
सभी ऋतुओं में गुनगुना पानी पीना लाभप्रद है।
ग्रीष्म ऋतु में प्राय: लोग फ्रिज का पानी पीते हैं। यह कई प्रकार के रोग को जन्म देता है। इसकी बजाय घड़े या सुराई का पानी पिएं।
पानी सदा बैठ कर पियें; खड़े होकर के नहीं। खड़े होकर पानी पीने से घुटनों में दर्द होता है।
पानी सदा एक एक घूंट करके पीना चाहिए, एकदम गढ़ गढ़ करके नहीं। किसी पाश्चात्य विद्वान ने कहा है : "We should drink food and eat water" अर्थात् हमें खाने को पीना चाहिए और पानी को खाना चाहिए।
आयुर्विज्ञान का निर्देश है : "भोजनमध्ये जलं पिबेत मुहुर्मुहु:।" अर्थात् भोजन करते समय बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में जल पियें परन्तु बाद में नहीं क्योंकि "भोजनान्ते विषं वारि:।" भोजन के अन्त में पानी विष के समान है।
भोजन एवं जलपान सम्बन्धी वाग्भट का कथन है :
भुक्तस्यादौ जलं पीतमग्निसादं कृशाङ्गताम्।
अन्ते करोति स्थूलत्वमूर्ध्वमामाशयात् कफम्।
मध्ये मध्याङ्गतां साम्यं धातुनां जरणं सुखम्।।
भोजन से पहले (खाली पेट) पिया हुआ पानी जठराग्नि को मन्द और शरीर को कमज़ोर बनाता है। भोजन के बाद पिया हुआ पानी मोटापा बढ़ाता है और अमाशय के ऊपरी भाग अर्थात फेफड़ों में कफ पैदा करता है। भोजन के बीच में पिया हुआ जल शरीर के अङ्गों में यथोचित पुष्टता पैदा करता है, शरीर की धातुओं में समता बनाता है और अन्न के पाचन में सहायक होता है।
आत्रेयसंहिता में यह भी विधान किया गया है कि कब पानी नहीं पीना चाहिए।
अध्वाश्रान्ते क्षुधाकान्ते शोकक्रोधातुरेषु च।
विषमासनोपविष्टे च पीतं वारि रुजाकरम्।
तस्मात् प्रसन्ने मनसि पानीयं मन्दमाचरेत्।।
अर्थात् बहुत अधिक मार्ग चल कर थकने पर, अधिक भूख लगने पर, बहुत दु:खी व अधिक क्रोधित होने पर, टेढ़े-मेढ़े या उल्टे आसन में बैठने पर, पिया हुआ पानी विकार/ रोग उत्पन्न करता है। अत: (इन अवस्थाओं के दूर होने पर) मन प्रसन्न होने पर धीरे- धीरे पानी का सेवन किया जाए।
ध्यानाकर्षण
क्योंकि जल ही जीवन है, इसलिए जल के संरक्षण एवं इसकी शुद्धि का दायित्व सब पर है।
जलनेति
कोरोना विशेषज्ञ डाक्टरों का कहना है कि इसका वायरस नाक और मुंह से प्रवेश करके पहले गले को इन्फैक्ट करता है फिर छाती में पहुँच कर फेफड़ों तथा शरीर के अन्य भागों को प्रभावित करता है।
कंठ और फेफड़ों सम्बन्धी कुछ प्राणायाम हमने पूर्व लेखों में सुझाए हैं।
कंठ में कोरोना वायरस को निष्क्रिय करने के लिए, जल चिकित्सा की एक विधि गरारे (Gargling) है, जो अत्यंत लाभदायक मानी जाती है। वैसे तो यह विधि कोरोना के पहले से सदियों से प्रचलित है, परन्तु अब इसका महत्त्व प्रत्यक्ष अनुभव किया गया है। गुनगुने (warm) पानी में थोड़ा नमक डाल कर दो मिनट सुबह प्रतिदिन गरारे करना कोरोने से बचने का सुरक्षा कवच है।
अब नासिका शोधक जलनेति क्रिया का वर्णन करते हैं।
हठयोग में षट् अर्थात् छः क्रियाओं का वर्णन मिलता है जिसे षट्कर्म भी कहते हैं। वे हैं नेति, धौति, वस्ति, नौली, कपालभाति और त्राटक।
नेति दो प्रकार की है -- जल नेति एवं सूत्रनेति। जलनेति में नली वाले लोटे से एक नासिका से गुनगुना पानी जिस में थोड़ा नमक मिला हो, अन्दर डाला जाता है और दूसरी नासिका से बाहर निकाल दिया जाता है।
जलनेति करने के लिए घुटनों के बल बैठें, लोटा दाहिने हाथ में ले लें और सिर को बाईं ओर झुकाएँ।
कुछ क्षणों के लिए श्वास रोक लें (स्तम्भवृति प्राणायाम)।
अब दाहिनी नासिका में लोटे की नली से पानी डालें। कुछ प्रयत्न के पश्चात् स्वतः पानी बाईं नासिका से बाहर आ जाएगा। दोनों नासिकाएं एक छिद्र से जुड़ी हैं।
इस प्रकार उलट दिशा में बाईं नासिका से पानी डालेंगे तो दाहिनी नासिका से बाहर आ जाएगा।
जलनेति करते समय श्वास नाक से मत लें, मुंह से लें। अगर कुछ क्षण श्वास रोक सकें ( स्तम्भ वृत्ति) तो और भी अच्छा है।
पानी को ऊपर मत खीचें, मुख में चला जाएगा। सहज भाव से यह स्वतः दूसरी नासिका से बाहर आ जाएगा।
सूत्र नेति में, एक सूत्र को क्रमशः बाईं एवं दाईं नासिका से डाल कर मुख से निकाला जाता है।
सूत्र नेति से जल नेति सरल है। इसलिए जलनेति की विधि यहां बतलाई गई हैै। सूत्रनेति के इच्छुक किसी क्रिया विशेषज्ञ से इसकी विधि सीखें।
जलनेति प्रातः प्रतिदिन की जा सकती है। सप्ताह में दो-तीन बार अवश्य करें। कोरोना काल में तो अवश्य ही प्रतिदिन करें।
जलनेति के बाद कपालभाति अवश्य करनी चाहिये। कपालभाति क्रिया भी है और प्राणायाम भी। इससे श्वास की नली की शुद्धि होती है।
(कपालभाति की विधि प्राणायाम सम्बन्धी पोस्ट में दी गई है।)
जलनेति के बाद कपालभाति करने से पानी अच्छी तरह नासिकाओं से बाहर निकल जाता है। अन्यथा, पानी के अन्दर रहने पर, सिर दर्द होने की संभावना रहती है।
जलनेति से नासिकाओं की सफ़ाई हो जाती है। मिट्टी, गर्दा, मल (म्यूकस) बाहर निकल जाते हैं। कभी सर्दी, जुकाम, छींके आदि की शिकायत नहीं होती ।
ध्यानाकर्षण:
हटयोग की षट् क्रियाएँ में कुछ काफ़ी कलिष्ट हैं। ये क्रियाएँ किसी विशेषज्ञ से सीख कर ही करनी चाहिएँ। जलनेति, जलधौति, शंख प्रक्षालन, कपालभाति और त्राटक काफ़ी सरल हैं। इनके करने की विधि यथा स्थान दे दी गई है।
उल्लेखनीय:
हठयोग की षट्क्रियाएँ या षट्कर्म अष्टाङ्गयोग योग के द्वितीय अङ्ग ‘नियम’ के ‘शौच’ साधन के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण हैं। शरीर में उत्पन्न हुए विकारों ( Toxins ) को इन क्रियाओं से दूर किया जा सकता है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती को 17 बार विष दिया गया था जो उन्होंने वस्ति, नौली आदि क्रियाओं से शरीर से बाहर निकाल दिया। ये क्रियाएँ शरीर को निरोग बना कर दीर्घायु प्रदान करती हैं। इसलिये कहा गया है ‘कालं वञ्चनार्थाय कर्म कुर्वन्ति योगिनः’ अर्थात् मृत्यु को चकमा देने के लिये योगी लोग कर्म (षट्क्रियाएँ) करते हैं।
i) धौति ii) शंख प्रक्षालन
कोरोना वायरस से नासिका एवं कण्ठ की सुरक्षा हेतु हमने कुछ प्राणायाम तथा क्रियाएं सुझाई हैं। अब छाती और पेट के शोधन हेतु धौति तथा शंख प्रक्षालन क्रियाओं का वर्णन करते हैं।
i) धौति
धौति का अर्थ है धोने की प्रक्रिया। इस क्रिया से खाने की नली ( Food Pipe ) एवं पेट की शुद्धि हो जाती है। धौति दो प्रकार की है -- वस्त्र धौति तथा जल धौति।
वस्त्र धौति में एक पतली कोमल कपड़े की पट्टी मुख से अन्दर निगली जाती है। एक सिरा बाहर रहता है। फिर इसे बाहर निकाल लिया जाता है। इससे बलगम आदि की सफ़ाई हो जाती है।
जल धौति इससे सरल है। सुबह शौच के पश्चात् बिना कुछ खाए 8-10 गिलास गुनगुना (Lukewarm) पानी जिसमें थोड़ा नमक मिला हो, पी लें।
फिर खड़े होकर आगे झुकें, थोड़ा पेट को दबाएँ तथा मुख में दो अंगुलियाँ डालकर जिह्नामूल को दबाएँ और वमन करें।
इससे पेट साफ़ हो जाता है, छाती साफ़ हो जाती है। कफ, श्वास, जलन (Acidity) एवं अन्य पेट और छाती सम्बन्धी रोगों के लिये लाभपद्र है।
जल धौति को प्रचलित भाषा में कुञ्जल (कुञ्जर क्रिया) भी कहते हैं। (कुञ्जर का अर्थ है हाथी अर्थात जैसे हाथी सूंड में पानी भर के बाहर निकाल देता है, वैसे करना)।
सप्ताह में एक बार धौति करना पर्याप्त है।
...............
ii) शंख प्रक्षालन
हठयोग में शंख प्रक्षालन क्रिया का भी उल्लेख है। शंख से अभिप्राय यहां उदर और वक्ष:स्थल से है। यह क्रिया वस्ति की भाँति उदर को स्वच्छ करती है और कुञ्जल की भांति वक्ष:स्थल की शुद्धि करती है।
इसकी प्रक्रिया इस प्रकार हैः
प्रातः 5-6 गिलास गुनगुना (Lukewarm) पानीजिस में नमक और दो निम्बू का रस मिला हो, पियें।
फिर ये आसन करें -- भुजंगासन, चन्द्रासन, कटिचक्रासन, अर्धमत्येन्द्रासन। चन्द्रासन में भुजाएँ ऊपर करके गर्दन और छाती को पीछे की ओर ऐसे झुकाया जाता है कि चन्द्र चॉप की आकृति बन जाए।
कटिचक्रासन में दोनों भुजाओं एवं शरीर के ऊपरी भाग तथा गर्दन को दोनों ओर घुमाया जाता है।
इन आसनों को दो-तीन बार करें। जब मल त्याग की इच्छा हो, तुरन्त शौचालय जाएँ।
तदनन्तर फिर 4-5 गिलास नमकीन गुनगुना पानी पियें और उपरोक्त आसन करें।
इच्छा होने पर, फिर मल त्याग करें। फिर 3-4 गिलास नमकीन गुनगुना पानी पियें और आसन करें तथा मल त्याग करें।
जब मल-त्याग समय केवल श्वेत पानी निकले, फिर 4-5 गिलास नमकीन गुनगुना पानी पियें।
अब आसन करने की आवश्यकता नहीं, कुञ्जल (कुञ्जर क्रिया) करें। अर्थात् सामने की ओर झुक कर, पेट पर थोड़ा बल दे कर, मुख में दो अंगुलियाँ डालकर, जिह्ना के मूल को दबाएँ और वमन करें।
अब शंख प्रक्षालन की प्रक्रिया पूरी हुई।
आधे घण्टे के बाद स्नान करें और दो घण्टे के बाद दलिया, खिचड़ी आदि हल्की चीज़ घी के साथ खाएँ।
शंख प्रक्षालन मास में एक बार पर्याप्त है।
इस क्रिया से पेट की सभी प्रकार की बीमारियां दूर हो जाती हैं। कोरोना आदि के वायरस भी निष्क्रिय हो जाता है तथा विषाक्त पदार्थ निकल जाते हैं।
ध्यानाकर्षण
शौच सम्बन्धी इन क्रियाओं का उद्देश्य शरीर शुद्धि और स्वास्थ्य लाभ के अतिरिक्त साधक को अपने शरीर की गंदगी को दर्शा कर, इसके प्रति घृणा पैदा करना है ताकि अन्यों के सौंदर्य के प्रति वह मोहित न हो। योगदर्शन (2.40) का सूत्र हैः "शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः" अर्थात् शौच से स्वशरीर के प्रति घृणा उत्पन्न होती है और अन्यों से संसर्ग (शारीरिक सम्बन्ध) की भावना से निवृत्ति होती है।
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