सेल्स की रीसाइक्लिंग यानी ऑटोफैजी

उपवास सेहत के लिए खास

उपवास हमारी संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा रहा है। लेकिन हाल में बीमारियों से लड़ने और सेहत को दुरुस्त रखने के लिए भी उपवास या लंबे समय तक भूखे रहने का चलन काफी बढ़ गया है। मेडिकल साइंस भी इसे स्वीकार कर रहा है। उपवास किस तरह बीमारियों से लड़ने में मदद कर सकता है, बता रही हैं प्रियंका सिंह:

सेल्स की रीसाइक्लिंग यानी ऑटोफैजी
व्र त, उपवास या एक तय वक्त तक भूखे रहना क्या सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा है या फिर यह फिट रहने और बड़ी बीमारियों से लड़ने में भी मदद करता है। मेडिकल साइंस के अनुसार उपवास न सिर्फ शरीर की इम्यूनिटी को बढ़ाता है, बल्कि खतरनाक और बीमार सेल्स को भी खत्म करता है। इस सोच को पहली बार ग्लोबल लेवल पर स्वीकार्यता मिली साल 2016 में, जब मेडिसिन का नोबल पुरस्कार टोक्यो इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में प्रफेसर योशिनोरी ओहसुमी को मिला। उन्हें यह अवॉर्ड सेल्स की रीसाइक्लिंग यानी ऑटोफैजी (autophagy) के लिए मिला। ऑटोफैजी एक बेहद जरूरी कुदरती बायोलॉजिकल प्रोसेस है, जिसमें शरीर के सेल्स या कोशिकाएं अपने भीतर मौजूद खराब, क्षतिग्रस्त या अनावश्यक हिस्सों को तोड़कर खत्म कर देती हैं और फिर से नए उपयोगी अणुओं में बदल लेती हैं। ऑटोफैजी शब्द ग्रीक भाषा से आया है, जिसमें Auto का मतलब है 'स्वयं' और Phagy का अर्थ है 'खाना' यानी 'खुद को खाना'।


सेल्स कैसे खुद को बनाते हैं नया

हमारे शरीर में सेल्स और सेल के कुछ हिस्से लगातार बदलते रहते हैं। हमारा शरीर खराब कोशिकाओं या फिर कोशिकाओं के जो हिस्से खराब हैं, उन्हें रिपेयर करने की कोशिश करता रहता है। अगर रिपेयर नहीं हो पाता तो खराब कोशिका या उसके हिस्से को ही खत्म कर देता है ताकि ये शरीर को नुकसान न पहुंचाएं। यह काम कोशिकाएं खुद करती है इसीलिए इसे 'सेल्स का स्यूसाइड' भी कहा जाता है। जब शरीर में भोजन की कमी होती है, यानी उपवास या फास्टिंग की स्थिति आती है, तो खराब कोशिकाओं के खत्म होने की प्रक्रिया तेज होती है। जब खाने से पोषण नहीं मिलता तो शरीर में ग्लूकाकोन हॉर्मोन रीलिज होता है, जो शुगर को बढ़ाता है और खराब कोशिकाओं के खत्म होने की रफ्तार बढ़ जाती है। ऐसे में कोशिकाएं अपने अंदर पुराने, खराब प्रोटीन, क्षतिग्रस्त और दूषित हिस्सों को छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ती हैं। फिर इन टुकड़ों को रीसाइकिल करके ऊर्जा या नए सेलुलर कॉम्पोनेंट के रूप में इस्तेमाल करती हैं। इसे ही ऑटोफैजी कहा जाता है। इस प्रक्रिया से शरीर अपने आप को साफ़ करता है और खुद को नया बनाने में लग जाता है। वैसे, सिर्फ उपवास ही नहीं, बल्कि बल्कि रात में सोते हुए, एक्सरसाइज करते हुए और कभी-कभी तनाव के वक्त भी ऑटोफैजी सक्रिय होती है।

ऑटोफैजी शुरू होने के लक्षण
शरीर में ऑटोफैजी का बदलाव कोशिकाओं के स्तर पर होता है इसलिए इससे सीधे तौर पर पहचानना मुश्किल होता है लेकिन कुछ संकेतों से हम अंदाजा लगा सकते हैं। इसलिए इन बातों का ध्यान रखें-

शुरुआत में थोड़ा थकान या कमजोरी महसूस हो सकती है, लेकिन कुछ समय बाद ऊर्जा स्थिर और साफ महसूस होने लगती है। शरीर अब पुराने मलबे को साफ कर नई ऊर्जा बना रहा होता है।

दिमाग की धुंधलाहट कम हो सकती है। आपको अधिक फोकस और सतर्कता महसूस हो सकती है।

लंबे समय तक उपवास करने पर, भूख की तीव्रता थोड़ी कम हो सकती है, जो संकेत हो सकता है कि शरीर ने खुद को अंदर से खपत करना शुरू कर दिया है।

कुछ दिनों बाद त्वचा की चमक में सुधार दिख सकता है, क्योंकि शरीर अंदर से सफाई कर रहा होता है।

शरीर की सूजन और भारीपन कम हो सकता है और जोड़ों के दर्द में आराम मिल सकता है।

शरीर जब फैट को जलाना शुरू करता है, तो कीटोन बॉडीज बनती हैं। यह भी ऑटोफैजी के सक्रिय होने का एक संकेत है। इसे केवल ब्लड टेस्ट या बॉयोमार्कर टेस्ट से ही जांचा जा सकता है।

कब शुरु होती है ऑटोफैजी

ऑटोफैजी जल्द शुरू नहीं होती। आमतौर पर से घंटे उपवास करने के बाद ऑटोफैगी के शुरुआती संकेत दिखने लगते हैं। अगर उपवास और लंबा चले ऑटोफैजी और गहरी हो जाती है। लेकिन हर इंसान का शरीर अलग होता है। कुछ लोगों में 12 घंटे में ऑटोफैजी शुरू हो सकती है, तो कुछ में 16 घंटे लग सकते हैं। यह इस पर भी निर्भर करता है कि आपका पिछला भोजन कितना भारी था, आपकी उम्र कितनी है, आपकी जीवनशैली कैसी है, और आपके शरीर की स्वास्थ्य स्थिति क्या है। कई लोग 48 घंटे भी भी उपवास करने की कोशिश करते हैं, जोकि सही नहीं है। बहुत लंबे उपवास सशरीर में कीटोन बॉडी बनने लगते हैं, जो अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं। हमारा ब्रेन कीटोन बॉडी को इस्तेमाल कर लेता है, बाकी हिस्से नहीं। इसके अलावा, शरीर में स्टारवेशन शुरू हो जाता है। इससे बचाव के लिए जरूरी है कि 24 घंटे से ज्यादा उपवास न रखें। इस बीच पानी, नीबू पानी या छाछ आदि लेते रहें। बार-बार उपवास रखेंगे और हाइड्रेशन पूरा नहीं रखेंगे तो किडनी स्टोन का खतरा बढ़ जाएगा।

ऑटोफैजी के फायदे

1. कोशिकाओं की सफाई : खराब या बेकार हो चुके हिस्से हटाकर कोशिकाओं को स्वस्थ बनाती है।

2. फैट कम होनाः भूखे रहने के दौरान शरीर में पहले से जमा फैट का इस्तेमाल कर फैट कम करती है।

3. बुढ़ापे की रफ्तार कमः रिसर्च में पाया गया है कि ऑटोफैजी से उम्र बढ़ने के प्रभाव धीमे होते हैं।

4. बीमारियों से बचावः कैंसर, डायबिटीज, दिल की बीमारी, लिवर से जुड़ी बीमारियां (फैटी लिवर, हेपटाइटिस आदि) और बढ़ती उम्र के साथ होने बीमारियां जैसे कि अल्जाइमर्स, पार्किंसंस, डिमेंशिया आदि के खतरे कम कर याद्दाश्त को बेहतर कर सकती है।

5. इम्यून सिस्टम को मजबूत बनानाः ऑटोफैजी से शरीर को वायरस और बैक्टीरिया से लड़ने में मदद मिलती है। इससे टीबी, हेपेटाइटिस सी जैसी बीमारियों से बचाव में मदद मिलती है।

6. शरीर की सजून को कम करनाः शरीर की अंदरूनी सूजन का कम करने में मदद करती है।

7. दिमागी स्पष्टता में बढ़ोतरी: इससे ब्रेन फॉग से राहत मिलती है और दिमागी स्पष्टता बढ़ती है।

ऑटोफैजी और कैंसर

ऑटोफैजी को कैंसर को रोकने में भी प्रभावी माना जा रहा है। इस प्रक्रिया में बेकार सेल्स या सेल्स के खराब हिस्सों के नष्ट होने से कैंसर की आशंका को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन एक बार अगर कैंसर हो गया तो लंबी फास्टिंग से परहेज करना ही बेहतर है। कैंसर के विकसित होने के बाद कुछ मामलों में कैंसर सेल्स पोषण और ऑक्सीजन की कमी होने पर ऑटोफैजी का इस्तेमाल खुद को बचाने के लिए भी करने लगते हैं। इसलिए अगर किसी का इलाज चल रहा है (जैसे कीमोथेरेपी या इम्यूनोथेरेपी) तो ऑटोफैजी से या तो परहेज करना चाहिए या अगर करना है तो सिर्फ और सिर्फ डॉक्टर की देखरेख में करें।

हो सकता है नुकसान भी

अगर कोई बहुत ज्यादा समय तक भूखा रहे तो कुपोषण की स्थिति भी बन सकती है। इससे शरीर कमजोर हो जाता है और इम्यून सिस्टम गिरने लगता है। जब शरीर लगातार भूखा रहता है, तो कोशिकाएं अत्यधिक तनाव में आ जाती हैं। यह क्रॉनिक सेल्सुलर स्ट्रेस डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे कैंसर बनने की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए ऑटोफैजी का कॉन्सेप्ट तब तक सही है, जब उपवास या भूखा रहना एक संतुलित, सीमित समय के लिए किया जाए जैसे इंटरमिटेंट फास्टिंग जिसमें 16 घंटे उपवास और 8 घंटे खाने का समय हो। संक्षेप में कहा जाए तो सीमित समय का उपवास ऑटोफैजी को बढ़ाकर शरीर को स्वस्थ रखता है और कैंसर से बचाव कर सकता है, जबकि जरूरत से ज्यादा भूखे रहने से शरीर कमजोर पड़ता है, इम्यून सिस्टम गिरता है, और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसके संभावित साइड इफेक्ट्स में शामिल हैं:

ऑटोफैजी के दौरान, शरीर के कुछ हिस्से टूटने या डिटॉक्सिफाई होने से पाचन तंत्र पर दबाव पड़ सकता है, जिससे पेट में दर्द, गैस या सूजन हो सकती है।

यह कुछ समय के लिए ऊर्जा की कमी और थकावट का कारण बन सकता है।

अत्यधिक ऑटोफैजी की प्रक्रिया में शरीर मांसपेशियों से प्रोटीन को भी तोड़ सकता है, जिससे मांसपेशियों की कमजोरी और नुकसान हो सकता है।

लंबे समय तक ऑटोफैजी की प्रक्रिया में रहने से हॉर्मोनल असंतुलन हो सकता है, जिससे मूड स्विंग्स, चिंता या अवसाद हो सकता है।

ऑटोफैजी के दौरान, शरीर अधिक पानी का उपयोग करता है, जिससे पानी की कमी हो सकती है।

ध्यान रखें :

बहुत ज्यादा लंबा उपवास करना भी नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। खासतौर पर बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग जैसे कि डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, एसिटिडी और दिल की बीमारी से पीड़ित लोग लंबा उपवास न करें।

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