जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा (उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय)

जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा (उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय)

इकाई 1 
जल तत्व परिचय, जल चिकित्सा की अवधारणा, महत्व एवं सावधानियाँ

1.1 प्रस्तावना
1.2 उद्देश्य
1.3 जल तत्व परिचय
1.4 जल चिकित्सा की अवधारणा
1.5 जल चिकित्सा का महत्व
1.6 जल चिकित्सा की सावधानियाँ
1.7 सारांश
1.8 पारिभाषिक शब्दावली
1.9 अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
1.10 संदर्भ ग्रन्थ सूची
1.11 निबन्धात्मक प्रश्न
1.1 प्रस्तावना

प्रिय साथियों, इस समस्त प्रकृति का निर्माण आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी नामक पांच तत्वों से होता है। आकाश तत्व इन पंचतत्वों में सबसे सूक्ष्म तत्व है। तत्वों में आकाश तत्व की स्थूलता के क्रम में बढते हुए क्रमश आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल एवं जल से पृथ्वी तत्व का वर्णन होता है। यह पंचतत्व एक समयोग में संयुक्त होकर संसार और मानव शरीर की रचना भी उपरोक्त पँच तत्व ही करते हैं। मानव शरीर की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-
क्षितिज पावक जल गगन समीरा, पंचतत्व रचित अधम शरीरा।

इस प्रकार मानव शरीर उपरोक्त पँच तत्वों के समयोग का परिणाम है। ईश्वर के वाचक शब्द भगवान के अक्षरों का विश्लेषण करें तो भ अर्थात भूमि (पृथ्वी), ग अर्थात गगन (आकाश), व अर्थात वायु, अ अर्थात अग्नि तथा न अर्थात नीर (जल) भी पँच तत्वों की ओर संकेत करता है। इन पाँच तत्वों में एक प्रधान तत्व जल है जो प्रकृति के साथ साथ मानव शरीर में प्रमुखता से विद्यमान रहता है। शरीर चिकित्सकों के अनुसार मानव शरीर का 70 प्रतिशत भाग जल तत्व ही है। शरीर में इस जल तत्व का समयोग स्वास्थ्य एवं इस तत्व की विषम अवस्था रोगों को उत्पन्न करती है।

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि जल तत्व हमारे शरीर का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्व है लेकिन यह जल तत्व क्या होता है? इस तत्व का शरीर में क्या महत्व है ? इस तत्व के प्रयोग में क्या क्या सावधानियों का पालन करना चाहिए ? ऐसे प्रश्न है जो इस विषय को सुनते ही आपके मन में उपस्थित हुए होगें। प्रिय पाठकों, प्रस्तुत इकाई में आप इस विषय को अच्छी प्रकार एवं सुव्यवस्थित रुप में समझकर उपरोक्त प्रश्नों के उत्तरों को जान पाएगें।

1.2 उद्देश्य

इस इकाई के अध्ययन के बाद आप

> जल तत्व का परिचय प्राप्त कर सकेंगे।
➤ जल तत्व की अवधारणा का ज्ञान प्राप्त कर सकेगें।
> जल तत्व का सामान्य परिचय प्राप्त करोगें।
> जल तत्व को समझाने में सक्ष्म हो सकेगें।
> जल तत्व के महत्व को जान पाओगें।
> प्रस्तुत इकाई के अन्त में दिए गये प्रश्नों के उत्तर दे सकेंगे।

1.3 जल तत्व का परिचय

प्रिय पाठकों, पँच तत्व और पँच महाभूत एकार्थी शब्द है अर्थात पंचतत्वों को पँच महाभूतों के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। भूत शब्द संस्कृत की भू धातु से उत्पन्न होता है। संस्कृत भाषा में भू धातु विद्यमान होने अथवा सत्तावान होने के अर्थ में प्रयुक्त होती है। इस प्रकार जो विद्यमान होता है अथवा उपस्थित रहता है, भूत कहलाता है और जो प्रबलता के साथ अथवा प्रमूखता से उपस्थित रहता है उसे महाभूत कहा जाता है। वह पाँच तत्व जो प्रकृति में प्रमुखता से विद्यामान रहते हैं पँच तत्व कहलाते हैं। सृष्टि की रचना करने वाले आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी नामक पाँच तत्वों को सम्मिलित रुप से पंचतत्वों की संज्ञा दी जाती है। इन पाँच तत्वों का परिचय प्राप्त करने के पश्चात आपके मन में इन तत्वों की उत्पत्ति के विषय के जानने की इच्छा भी अवश्य ही उत्पन्न हुई होगी। इसके साथ साथ किस तत्व से किस तत्व का निर्माण होता है, यह प्रश्न भी आपके मन में अवश्य ही उत्पन्न हुआ होगा।

जिज्ञासु पाठकों, इस सृष्टि में सर्वप्रथम ईश्वरीय शक्ति से शब्द तन्मात्रा उत्पन्न हुई। इस शब्द तन्मात्रा से सर्वप्रथम आकाश तत्व की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात शान्त आकाश में कालगति से विकार उत्पन्न होने पर वायु तत्व उत्पन्न हुआ। वायु शब्द एवं स्पेश तन्मात्रा से युक्त तत्व था जिसमें विकार उत्पन्न होने से अग्नि तत्व की उत्पत्ति हुई। अग्नि तत्व शब्द, स्पेश एवं रुप गुण से युक्त था। इस अग्नि तत्व में विकार उत्पन्न होने पर जल तत्व की उत्पत्ति हुई। जल तत्व शब्द, स्पेश, रुप एवं रस गुण युक्त था। जल तत्व में विकार उत्पन्न होने से गन्ध तन्मात्रा युक्त पृथ्वी तत्व की उत्पत्ति हुई। पृथ्वी तत्व पंचतत्वों में अन्त में उत्पन्न होने वाला सबसे स्थूल तत्व था जो शब्द, स्पेश, रुप, रस एवं गन्ध गुण से युक्त था। जल तत्व अग्नि के विकार से उत्पन्न होता है एवं जल तत्व के विकार से पृथ्वी तत्व की उत्पत्ति होती है। इस तथ्य को यदि हम प्रयोग के रुप में समझे तो सागर का जल अग्नि के सम्र्पक में आकर वाष्प रुपी बादल के रुप में उड जाता है एवं शेष रुप में नमक (पृथ्वी तत्व) रह जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि जल तत्व के विकार से पृथ्वी तत्व की उत्पत्ति होती है।

प्रिय विधार्थियों, इस इकाई में अध्ययन का प्रमुख विषय जल तत्व है जिसकी उत्पत्ति वायु एवं अग्नि तत्वों से होती है। आधुनिक वैज्ञानिक एक वैज्ञानिक प्रयोग के आधार पर इस तथ्य को सिद्ध भी करते हैं। इसके लिए एक बीकर में निश्चित अनुपात में

जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा

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हाइड्रोजन एवं आक्सीजन गैस मिलाकर बैटरी से स्र्पाक करने पर जल उत्पन्न होता है। वैज्ञानिकों का यह प्रयोग इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि जल तत्व वायु एवं अग्नि तत्व के संयोग से उत्पन्न होता है।

आधुनिक वैज्ञानिक पृथ्वी पर जीवन का प्रारम्भ जल तत्व में ही स्वीकार करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर जीवन का प्रारम्भ जल में ही हुआ। सर्वप्रथम जलीय जीवों की उत्पत्ति के बाद थलीय जीवों की उत्पत्ति हुई। यह जल तत्व जलीय एवं स्थलीय दोनों ही प्रकार के जीवों के लिए समान रुप से आवश्यक तत्व है। इस तत्व की महिमा का वर्णन प्राचीन ऋषि मुनियों से लेकर आधुनिक वैज्ञानिको तक ने किया है। अनेक वैदिक कर्मकाण्डों में जल को अमृत रुप मानक जल से प्रक्षालन, आचमन एवं संकल्प धारण आदि कियाओं का उपदेश किया गया है। वैदिक दैनिक अग्निहोत्र में दाहिनी हाथ की हथेली में जल लेकर निम्न मंत्र से तीन बार आचमन करने का विधान है-

ओ३म् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।

ओ३म् अमृतापिधानमसि स्वाहा।

ओ३म् सत्यं यशः श्रीर्मयी श्रीः श्रयतां स्वाहा ।।

तैत्तिरीय अरण्यक)

(

अर्थात हे अविनाशी परमेश्वर ! आप सबके रक्षक हैं। आन्तरिक एवं बाह्य दुखों से हमारी रक्षा कीजिए। हे परम दाता प्रभों ! हम आपकी कृपा से सच्चा ज्ञान, विमल कीर्ति, भौतिक सम्पननता एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करें। हम आपके उदार स्वाभाव से परिचित हैं और अपने साथियों को परिचित कराते हैं।

1.4 जल चिकित्सा की अवधारणा

पाठकों, पँच तत्वों में जल तत्व का अपना एक विशिष्ट स्थान है। स्थूलता के आधार पर जल तत्व दूसरा स्थूलतम् तत्व है जिसे सामान्य भाषा में पानी, वारि, नीर, तोय, अम्बु, सलिल, आप, उदक तथा अमृत आदि नामों से जाना जाता है। यह जल तत्व पृथ्वी पर प्रर्याप्त मात्रा में उपस्थित है। वैज्ञानिकों के अनुसार सम्पूर्ण पृथ्वी का 70 प्रतिशत जल तत्त्व से र्निमग्न है। जिस प्रकार पृथ्वी का 70 प्रतिशत भाग जल तत्व से परिपूर्ण है ठीक उसी प्रकार मानव शरीर का भी 70 प्रतिशत भाग जल तत्व ही है। यह जल तत्व जीवधारियों के जीवन का आधार होता है। इस तत्व के अभाव में जीवन की कल्पना ही नही की जा सकती है। मनुष्य के जीवन का आधार भी यह जल तत्व ही है। इन तत्व के द्वारा मनुष्य विभिन्न दैनिक एवं निमेतिक कार्यों के करने में सक्ष्म होता है। इस तत्व के अभाव में मनुष्य के दैनिक एवं निमैतिक कार्यों में अवरोध उत्पन्न हो जाता है।

यद्यपि सामान्य रुप से मनुष्य इस तत्व का प्रयोग पीने के रुप में, स्नान के रुप में एवं अन्य शरीर शोधक कियाओं के रुप में प्रतिदिन प्रातःकाल से लेकर रात्रिकाल तक करता रहता है किन्तु जब जल तत्व का प्रयोग एक चिकित्सक द्वारा वैज्ञानिक विधिनुसार रोगों क उपचार के उद्देश्य से किया जाता है तब वह जल चिकित्सा कहलाती है। जल चिकित्सा के अन्तर्गत उषापान, एनीमा किया, विभिन्न प्रकार के स्नान एवं अंगों की लपेट का वर्णन आता है। यद्यपि जल चिकित्सा प्राचीन काल से प्रचलित चिकित्सा है। परन्तु मध्य काल में इस चिकित्सा का प्रचलन कम हो गया था। इस चिकित्सा के पुनरुथान में पश्चिमी चिकित्सकों ने अपना विशेष योगदान देकर इसको समाज में पुनः प्रचलित करने में

जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा

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विशेष भूमिका वहन की। इस क्रम में विनसेंज प्रिस्निज, सेबस्टियन नीप एवं लुई कूने आदि प्राकृतिक चिकित्सकों ने जल चिकित्सा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। फादर सेबस्टियन नीप द्वारा रचित पुस्तक My Water Cure जल चिकित्सा की एक श्रेष्ठ पुस्तक है। इन चिकित्सकों के प्रयोगों से प्रभावित होकर भारतीय चिकित्सकों एवं विद्वानों ने जल चिकित्सा के महत्व को समझकर इसका अनुप्रयोग स्वमं पर किया तथा स्वंम पर इसके सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने पर इन्होने इस अपना जीवन इस चिकित्सा पद्धति के प्रचार प्रसार में लगाया। इस प्रकार वर्तमान समय में सम्पूर्ण भारत वर्ष में जगह जगह अनेकों स्थानों पर जल चिकित्सा (प्राकृतिक चिकित्सा) केन्द्र खुले हुए हैं जहाँ नियमित रुप से जल तत्व के प्रयोग द्वारा अच्छे स्वास्थ को प्राप्त किया जाता है।

जल तत्व शरीर शुद्धिकरण का सबसे प्रमुख एवं मूल साधन है। जल तत्व के भलिभांति प्रयोग करने से शरीर में शुद्धता एवं स्वच्छता बनी रहती है जबकि इस तत्व के भलि भांति प्रयोग नही करने पर शरीर में इस तत्व का योग विषम हो जाता है तथा इस तत्व का विषम योग होने पर अनेक प्रकार के रोगों की उत्पत्ति होती है। मानव शरीर में जल तत्व को सम बनाने हेतु अनेक विधियों का प्रचलन है। जल तत्व से चिकित्सा को प्राकृतिक चिकित्सा में जल चिकित्सा के नाम से जाना जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में जल तत्व को एक महाऔषधि के रुप में प्रयोग किया जाता है। वास्तव में जल तत्व का प्रयोग करने से शरीर को एक विशेष प्रकार ताजगी एवं स्फूर्ति प्राप्त होती है। प्रायः हम अनुभव करते हैं कि कार्य की गहरी थकान होने पर ठंडे जल से स्नान करने पर जो ताजगी प्राप्त होती है वह ताजगी एवं स्फूर्ति संसार की किसी अन्य दवाई से प्राप्त नही की जा सकती है। जल तत्व के इस गुण का प्रयोग प्राकृतिक चिकित्सा में किया जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा में जल तत्व का प्रयोग विभिन्न रोगों के उपचार में विशेष लाभकारी प्रभाव रखता है। विदेशों में प्रमुख रुप से जर्मनी एवं इग्लैण्ड आदि देशों में प्राकृतिक चिकित्सा के नाम से विभिन्न जल केन्द्र खुले हुए हैं जहां पर जल को एक सुपर मैडिसन के रुप में प्रयोग किया जाता है। प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक डॉ० लिण्डलहार के अनुसार बुखार ठीक करने में अन्य औषधियों की तुलना में जल 1/10 समय लेता है अर्थात औषधियों का प्रयोग करने से यदि बुखार दस दिनों में ठीक होता है तो वहीं जल के प्रयोग (गीली चादर, एनीमा एवं अन्य प्रयोगों द्वारा) से बुखार एक दिन में ही ठीक हो जाता है। प्रायः तेज बुखार होने पर माथे पर ठंडे जल की गीली पट्टी देने से बुखार में तुरन्त लाभ मिलता है एवं शरीर का तापक्रम सामान्य हो जाता है। वर्तमान समय में जल चिकित्सा एक वृहद्ध शास्त्र के रुप में विकसित हो चुकी है। विश्व के अन्य देशों के साथ साथ भारत वर्ष के अनेक भागों में जल चिकित्सा के केन्द्र हाइड्रोथेरेपी सेंटर के रुप में एवं वाटर किंगडम के रुप में विकसित हो रहे हैं। इन केन्द्रों में जल को आधार मानकर विभिन्न ऐसी कियाएं अथवा कार्य कराए जाते हैं जिनका मानव के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर अनुकूल एवं सकारात्मक प्रभाव पडता है।

प्रिय पाठकों, मानव शरीर का निर्माण कोशिकाओं से हाता है। शरीर की कोशिकाओं का प्रमुख घटक द्रव्य जल तत्व ही होता है। कोशिकाओं में उपस्थित कोशिका द्रव्य का मूल आधार जल तत्व ही होता है। शरीर की कोशिका जल तत्व के माध्यम से ही पोषण प्राप्त करती है एवं अपने अन्दर उपस्थित विषाक्त विजातीय पदार्थों को जल तत्व के माध्यम से अर्थात द्रवीय रुप में निष्कासित करती है। उम्र बढने पर कोशिकाओं के जल ग्रहण करने की क्षमता एवं निष्कासन की क्षमता धीमी पड जाती है जिसके परिणामस्वरुप

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अंगों की क्रियाशीलता कम हो जाती है, त्वचा पर झुर्रियाँ पडने लगती हैं एवं बुढापे के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। मानव शरीर की सबसे प्रमुख धातु रक्त का प्रमुख घटक द्रव्य भी जल तत्व ही होता है। जल तत्व की उपस्थिति के कारण रक्त शरीर में पोषक तत्वों के परिवहन एवं शरीर शोधन में प्रमुख भूमिका वहन करता है। जल चिकित्सा के माध्यम से शरीर की कोशिकाओं की जल ग्रहण करने की क्षमता को बढाया जाता है। जल चिकित्सा के द्वारा शरीर में जल तत्व को अधिक मात्रा में प्रदान करते हुए इस तत्व की विषमता से उत्पन्न रोगों का उपचार किया जाता है।

इस प्रकार उपरोक्त तथ्य स्पष्ट करते हैं कि जल तत्व मानव शरीर के लिए अत्यन्त उपयोगी एवं महत्वपूर्ण तत्व है जिसके अभाव में जीवन की कल्पना नही की जा सकती है। सामान्य रुप से एक स्वस्थ मानव प्रतिदिन लगभग ढाई लीटर जल का उत्सर्जन मूत्र, स्वेद एवं प्रश्वास आदि के रुप करता है। जल की इस मात्रा को प्रतिदिन ग्रहण करना भी अनिवार्य हाता है इसीलिए शरीर चिकित्सक प्रतिदिन तीन लीटर शुद्ध जल के सेवन का निर्देश देते हैं। इससे कम मात्रा में जल तत्व का सेवन करने से शरीर की आन्तरिक क्रियाओं में बाधाएं उत्पन्न होने लगती हैं एवं विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होने लगते हैं। जल चिकित्सा के माध्यम से जल तत्त्व का प्रयोग करते हुए रोगों का उपचार किया जाता है।

1.5 जल चिकित्सा का महत्व

प्रिय विद्यार्थियों, वर्तमान काल में जल चिकित्सा एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण चिकित्सा पद्धति के रुप में विकसित हो चुकी है। चूंकि आधुनिक समय चारों ओर प्रदूषण का स्तर बहुत तेजी से बढा है एवं मानव के खान पान में रासायनिक पदार्थों एवं परिरक्षक पदार्थों (Preservative) के सेवन की मात्रा बढी है जिनके परिणाम स्वरुप शरीर में विजातीय विष अधिक मात्रा में एकत्र होते हैं। शरीर को इन विताजीय विषों से मुक्त बनाने में जल चिकित्सा महत्वपूर्ण भूमिका वहन करती है। दिनचर्या के अपालन, भोजन की अनियमितता एवं मानसिक तनाव आदि कारक भी शरीर में विजातीय विषों के बोझ का बढा देते है इस अवस्था में शरीर शोधन की विशेष आवश्यक्ता होती है। शरीर शोधन में जल चिकित्सा एक अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका का वहन करती है। वास्तव में जल चिकित्सा एक ओर जहाँ शरीर शोधन का कार्य करती है तो वहीं दूसरी ओर अंगों की क्रियाशीलता को बढाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। जल चिकित्सा के प्रयोग से शरीर स्वच्छ, क्रियाशील, रोग रहित एवं स्वस्थ बनता है। शरीर के विभिन्न तंत्रों पर जल चिकित्सा लाभकारी प्रभाव रखती है। मानव शरीर के तंत्रो पर जल चिकित्सा के लाभकारी प्रभाव इसके महत्व को सिद्ध करता है। मानव शरीर के तंत्रों पर लाभकारी प्रभावों के आधार पर जल चिकित्सा के महत्व को

निम्न लिखित बिंदुओं द्वारा आसानी से समझा जा सकता है -

(क) रक्त परिसंचरण तंत्र पर जल चिकित्सा का प्रभाव :

प्रिय विधाथियों, जैसा कि आपने पूर्व में जाना कि जल तत्व का शरीर के रक्त के साथ सीधा सम्बन्ध होता है। शरीर में जल तत्व की कमी होने पर रक्त गाढा हाने लगता है। रक्त के गाढा हाने के कारण रक्त वाहिनीयों में इसके संचरण में बाधा उत्पन्न हाने लगती है जिससे रक्त चाप सम्बन्धी रोग उत्पन्न होने लगते हैं। इसके अतिरिक्त शरीर में जल तत्व के अभाव से विषाक्त पदार्थों की मात्रा बढने लगती है जिसका हृदय पर

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प्रतिकूल प्रभाव पडता है एवं इसके परिणाम स्वरुप हृदय से सम्बन्धित रोग उत्पन्न होने लगते हैं।

उपरोक्त अवस्था में जल चिकित्सा लाभकारी प्रभाव रखती है। जल चिकित्सा के अन्तर्गत उषापान, एनीमा, स्नान एवं लपेट आदि कियाओं का अभ्यास रोगी को विधिपूर्वक एवं नियमित रुप से करने से रक्त शुद्धिकरण की किया नीव होती है, रक्त परिसंचरण में स्वभाविक रुप से व्रीवता उत्पन्न होती है, रक्तचाप नियमित होता है एवं हृदय स्वस्थ, शक्तिशाली एवं ऊर्जावान बनता है। जल चिकित्सा के प्रभाव से रक्त हिमोग्लोबिन से परिपूर्ण बना रहता है एवं रक्त में ऑक्सीजन व कार्बन डाई ऑक्साइड को ग्रहण करने एवं छोडने की क्षमता अच्छी बनी रहती है। यद्यपि जल चिकित्सा का प्रयोग रक्त परिसंचरण तंत्र को स्वस्थ एवं रोग मुक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका वहन करता है किन्तु एक ध्यान देने योग्य प्रमुख तथ्य यह है कि उच्च रक्तचाप रोगी को गर्म जल से उपचार नही देना चाहिए अथवा अत्यन्त सावधानी पूर्वक देना चाहिए एवं गर्म जल से उपचार के बाद ठण्डे जल से उपचार अवश्य देना चाहिए।

(ख) पाचन तंत्र पर जल चिकित्सा का प्रभाव :

जिज्ञासु पाठकों, मानव शरीर जल तत्व को पाचन तंत्र के माध्यम से ग्रहण करता है। जिस कारण पाचन तंत्र का जल तत्व के साथ सीधा सम्बन्ध होता है। जल संसार का एक श्रेष्ठ घोलक द्रव्य है, इस द्रव्य में घोलकर विभिन्न पोषक तत्वों एवं लाभकारी पदार्थों को हम भोजन के रुप में ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार शरीर में जल तत्व की मात्रा को सम एवं विषम बनाने में पाचन तंत्र महत्वपूर्ण भूमिका वहन करता है उसी प्रकार शरीर में जल तत्व की मात्रा सम एवं विषम होने का इस तंत्र पर भी अनुकूल एवं प्रतिकूल प्रभाव पडता है। शरीर में जल तत्व की मात्रा विषम अथवा कम होने से कब्ज नामक रोग की उत्पत्ति होती है। इसके साथ साथ जल तत्व शरीर में भोजन के पाचन, अवशोषण एवं उत्सर्जन की किया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस तत्व के अभाव में भोजन के पाचन, अवशोषण उवं उत्सर्जन की किया पर नकारात्मक प्रभाव पडता है। जल तत्व की विषमता पाचन तंत्र में अनेक प्रकार के रोगों की उत्पत्ति होती है। पाचन तंत्र के इन रोगों में आँतों की शुष्कता, कब्ज, अपच, भूख नही लगना, पेट दर्द, गैस, यकृत विकार एवं मधुमेह आदि रोगों का वर्णन प्रमुख रुप से आता है।

उपरोक्त सभी रोगों में जल चिकित्सा लाभकारी प्रभाव रखती है। जल चिकित्सा की विभिन्न प्रविधियों द्वारा उपचार करने से इन रोगों में शीघ्र अतिशीघ्र लाभ प्राप्त होता है। इसके साथ साथ पाचन तंत्र को स्वस्थ एवं सक्रिय बनाने में भी जल चिकित्सा लाभकारी प्रभाव रखती है। पाचन तंत्र के रोगों में जल चिकित्सा के अन्तर्गत प्रायः गर्म जल का प्रयोग अधिक लाभकारी प्रभाव रखता है। इसके साथ साथ गर्म के साथ साथ ठण्डे जल का प्रयोग करने से तंत्र की क्रियाशीलता बढती है एवं रोगों से मुक्ति मिलती है। ( ग

) उत्सर्जन तंत्र पर जल चिकित्सा का प्रभाव :

जल तत्व में शुद्धिकरण का अत्यन्त विशिष्ट गुण होता है। शरीर जल तत्व के माध्यम से अपने अन्दर स्थित विषाक्त अथवा उत्सर्जी पदार्थों को निष्कासित करते हुए शुद्धता एवं स्वच्छता को धारण करता है। सरल शब्दों में शरीर के अन्दर के विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालने में जल तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसीलिए शरीर में जल तत्व विषम होने पर अथवा जल तत्व की कमी होने पर विजातीय पदार्थों का शरीर से भलिभांति निष्कासन नही हो पाता है एवं विजातीय विषों की मात्रा शरीर में ही बढ़ने लगती है। शरीर

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जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा

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में जल तत्व की प्रर्याप्त मात्रा होने पर वृक्कों की कियाशीलता भलिभांति बनी रहती है जबकि जल तत्व की कमी होने पर वृक्कों की कियाशीलता कम होने के साथ साथ वृक्कों में पथरी आदि रोग उत्पन्न होने लगते हैं। इसके अतिरिक्त वृक्क भलि भांति रक्त को साफ भी नही कर पाते हैं जिसके कारण अलग अलग प्रकार के त्वचा विकार भी उत्पन्न होते हैं।

(घ) शरीर की अस्थियों एवं पेशीय तंत्र पर जल चिकित्सा का प्रभाव :

प्रिय पाठकों, मानव शरीर की अस्थियों के अन्दर जल तत्व प्रमुख रुप से विद्यमान रहता है। चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार मानव अस्थि का 25 प्रतिशत भाग जल तत्व होता है। जल तत्व की उपस्थिति के कारण अस्थियों में लचीलापन एवं दृढता बनी रहती है। इसके अतिरिक्त शरीर की उपास्थियों में भी जल तत्व की उपस्थिति के कारण ही अधिक लचीलापन पाया जाता है।

शरीर में जल तत्व की कमी के कारण अस्थियों एवं उपास्थियों में कडापन एवं भंगुरता उत्पन्न हो जाती है। जल तत्व की कमी से अस्थियों एवं जोडों में अनेक प्रकार के दर्द एवं सूजन उत्पन्न होकर गठिया एवं आर्थराइटिस आदि रोगों को जन्म देते हैं। अस्थियों में जल तत्व की कमी होने पर अस्थि मज्जा में रक्त कणों के निर्माण की किया भी धीमी पड जाती है। अस्थियों के समान मॉसपेशियों की क्रियाशीलता में भी जल तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शरीर में जल तत्व की पर्याप्त मात्रा होने पर मॉसपेशियों की कियाशीलता बनी रहती है। इसके साथ साथ मॉसपेशियों के लचीलेपन एवं शक्ति में भी जल तत्व का महत्वपूर्ण योगदान होता है। जल तत्व की कमी होने पर मॉसपेशियों में शक्तिहीनता, कडापन एवं पेशियों सम्बन्धी अन्य रोगों की उत्पत्ति होती है। विभिन्न प्रकार के पेशियों में होने वाले दर्द में भी जल तत्व की कमी प्रमुख कारण होती है। इस प्रकार के रोगों में जल चिकित्सा के प्रयोग से शीघ्र लाभ प्राप्त होता है।

(ड) शरीर के तंत्रिका तंत्र पर जल चिकित्सा का प्रभाव :

मानव तंत्रिका तंत्र में जल तत्व प्रमुख रुप से उपस्थित तत्व है। यह तंत्र मकड़ी के जाले के समान सम्पूर्ण शरीर में फैला रहता है जिसके अन्तर्गत विभिन्न तंत्रिकाएं जल तत्व के माध्यम से बाह्य वातावरण से संवेदनाओं एवं प्रेरणाओं को ग्रहण करती हैं। जल तत्व के अभाव में तंत्रिकाओं की कार्यकुशलता एवं क्षमता कम हो जाती है। मानव मस्तिष्क में भी जल तत्व प्रमुख रुप से उपस्थित तत्व है। शरीर में जल तत्त्व के अभाव में विभिन्न प्रकार मस्तिष्क संम्बन्धी रोगों की उत्पत्ति होती है।

जल चिकित्सा के अन्तर्गत ठण्डे जल के प्रयोग से तंत्रिकाओं को बल मिलता है जबकि गर्म जल के प्रयोग से रक्त संचार व्रीव होने से तंत्रिकाओं की क्रियाशीलता बढती है। विभिन्न प्रकार के तंत्रिकाओं से सम्बन्धित रोगों में जल चिकित्सा का प्रयोग विशेष रुप से लाभकारी प्रभाव रखती है। मस्तिक विकारों में भी जल चिकित्सा के प्रयोग से लाभमिलता है।

इस प्रकार उपरोक्त तथ्य के आधार पर स्पष्ट होता है कि जल चिकित्सा शरीर के विभिन्न अंगों एवं संस्थानों पर लाभकारी प्रभाव रखती है जो जल चिकित्सा के महत्व को प्रकट करता है। वास्तव में जल में शोधन अथवा शुद्धिकरण का विशिष्ट गुण होता है। जल तत्व का यह गुण चिकित्सा के क्षेत्र में विशेष महत्वपूर्ण होता है। सामान्य रुप से विकृत आहार विहार के सेवन, अनियमित दिनचर्या एवं बाह्य प्रदूषण आदि कारकों के परिणामस्वरुप शरीर में विषाक्त पदार्थों की मात्रा बढती चली जाती है इन विषाक्त तत्वों की बढी हुई मात्रा अंगों की कियाशीलता में बाधा उत्पन्न करती है जिसके परिणामस्वरुप

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जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा

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अगों से सम्बन्धित तंत्र रोग से ग्रस्त हो जाता है। तंत्र की रोगावस्था को ठीक करने में एवं अंगों की कियाशीलता बढाने में जल चिकित्सा बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का वहन करती है। जल चिकित्सा का प्रयोग शरीर के समस्त आन्तरिक बाह्य अंगों का शोधन करते हुए उन्हे स्वस्थ एवं कियाशील बनाता है।

जिज्ञासु पाठकों, जल चिकित्सा के लाभकारी प्रभाव एवं महत्व को जानने एवं समझने के उपरान्त अब आपके मन में यह जिज्ञासा भी अवश्य ही उत्पन्न हुई होगी कि जल चिकित्सा के प्रयोग में किन किन सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए। चूंकि यहाँ पर जल चिकित्सा का प्रयोग रोगी पुरुषों पर किया जा रहा है अतः सावधानियों का ज्ञान होना अत्यन्त अनिवार्य है। अतः अब जल चिकित्सा की प्रमुख सावधानीयों पर विचार करते हैं

1.6 जल चिकित्सा की सावधानियाँ

जल चिकित्सा की प्रमुख सावधानियाँ इस प्रकार हैं-

(1) शरीर में कफ दोष की विकृत अवस्था में ठण्डे जल का अधिक प्रयोग रोगी पर नही करना चाहिए। तीव सर्दी, खाँसी, बुखार, जुकाम, टॉसिल्स, टी० बी०, दमा, जोडों में दर्द व सूजन, कमर दर्द, गठिया व आर्थराइटिस आदि रोगों की नीव अवस्था में रोगी पर ठण्डे जल का प्रयोग करने से रोग ओर अधिक नीव अवस्था को प्राप्त हो जाता है। अतः इन रोगों में ठण्डे जल का प्रयोग अत्यन्त सावधानिपूर्वक अथवा नही करना चाहिए। दठण्डे जल के प्रयोग से गठिया एवं आर्थाराइटिस रोगी के जोडों में दर्द एवं सूजन बढ जाती है।

(2) उच्च रक्तचाप, हृदय रोगी, मिर्गी एवं मानसिक तनाव से ग्रस्त रोगी को गर्म जल का उपचार अत्यन्त सावधानीपूर्वक अथवा नही देना चाहिए। इस प्रकार के रोगियों को गर्म जल का उपचार देने से रक्तचाप, हृदय गति एवं चयापचय दर असामान्य रुप से बढ जाती है जिसके परिणाम स्वरुप रोग की नीवता बढ जाती है एवं रोगी स्वमं को अधिक असहज अनुभव करने लगता है अतः इन रोगियों को गर्म जल का उपचार नही देना चाहिए।

(3) यदि गर्म जल के उपचार के तुरन्त बाद ठण्डे जल का उपचार भी रोगी को देना है तो सदैव उपचार का प्रारम्भ गर्म जल के साथ करना चाहिए एवं ठण्डे जल के उपचार पूर्ण करना चाहिए। अर्थात गर्म जल से उपचार प्रारम्भ करते हुए ठण्डे जल के प्रयोग के साथ उपचार समाप्त करना चाहिए।

(4) गर्म जल का उपचार देने अत्यन्त सावधानी रखनी चाहिए। गर्म जल का उपचार देने से पूर्व रोगी को एक से दो गिलास सामान्य तापक्रम का जल पीलाकर ही उपचार देना चाहिए। इसके साथ साथ रोगी के सिर को ठण्डे जल में अच्छी प्रकार भिगो लेने के उपरान्त ही गर्म उपचार जैसे भाप स्नान, गर्म कटि स्नान, गर्म रीढ स्नान आदि देने चाहिए। गर्म जल के उपचार के उपरान्त रोगी को कुछ समय शवासन में आराम करना चाहिए।

(5) गर्म जल का प्रयोग गर्दन से ऊपर के भाग पर नही करना चाहिए। विशेष रुप से सिर एवं आँखों पर गर्म जल का प्रयोग कदापि नही करना चाहिए। भाप स्नान जैसे गर्म उपचार में भी सिर को बाहर रखते हुए इसे गर्मी से बचाना चाहिए।

(6) रोग की अति तीव अवस्था, गंभीर जीर्ण रोग से ग्रस्त कमजोर रोगी, वृद्ध रोगी एवं गर्भवती स्त्री पर अधिक गर्म एवं अधिक ठण्डे जल का प्रयोग अत्यन्त

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जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा

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सावधानीपूर्वक करना चाहिए। इस प्रकार की अवस्था में एकदम से गर्म एवं ठण्डे जल का प्रयोग रोगी पर नही करना चाहिए। ठण्डे जल के प्रयोग करने से पूर्व शरीर को थोडा गर्म अथवा ऊर्जावान बनाकर ही ठण्डे जल का प्रयोग करना चाहिए। ठण्डे जल के उपचार के उपरान्त रोगी को एकदम से आराम नही करना चाहिए अपितु रोगी को कछ समय टहलना अथवा भ्रमण करना चाहिए।

(7) जल चिकित्सा के अन्तर्गत भाप एवं बर्फ के प्रयोग में अत्यन्त सावधानी रखनी चाहिए। बर्फ एवं भाप का प्रयोग तंत्रिका तंत्र की तंत्रिकाओं कर सीधा प्रभाव रखता है अतः इनका प्रयोग अत्यन्त सावधानीपूर्वक करना चाहिए।

(8) रक्त स्प्रव की अवस्था में गर्म जल का प्रयोग नही करना चाहिए। आँतों में घाव एवं आँतों में अल्सर की अवस्था में गर्म जल का आन्तरिक प्रयोग जैसे कुँजल एवं एनीमा आदि नही करने चाहिए।

(9) गर्म जल के अधिक लम्बे समय तक प्रयोग करने से त्वचा की सबसे बाहरी परत को हानि पहुँचने लगती है। अधिक गर्म जल के लम्बे समय तक प्रयोग करने से त्वचा में उपस्थित संवेदी तंत्रिकाएं मृत होने लगती है जिसके कारण त्वचा एवं शरीर में संवेदन हीनता की अवस्था उत्पन्न होने लगती है। इसके साथ साथ गर्म जल का अधिक लम्बे समय तक प्रयोग करने से मॉसपेशियों का स्वाभाविक बल (Muscle tone) भी कम होने लगता है एवं त्वचा लटकने लगती है।

(10) जल चिकित्सा सदैव खाली पेट ही देनी चाहिए तथा जल चिकित्सा के तुरन्त बाद कुछ नही खाना चाहिए अपितु कम से कम आधा से एक घटें के उपरान्त ही कुछ आहार ग्रहण करना चाहिए।

(11) जल चिकित्सा में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए एवं सदैव साफ स्वच्छ जल का ही चिकित्सा में प्रयोग करना चाहिए।

इस प्रकार उपरोक्त सावधानीयों को ध्यान में रखकर चिकित्सा करने से विभिन्न सामान्य एवं गंभीर रोगों के उपचार में जल चिकित्सा लाभकारी प्रभाव देती है। इन सावधानियों के अनुसार चिकित्सा करने से रोग में शीघ्र प्रभावकारी लाभ प्राप्त होते हैं एवं इसके साथा साथ सभी प्रकार के दुष्प्रभावों एवं हानियों से भी रोगी मुक्त रहता है।

अभ्यास हेतु प्रश्न

1- सत्य असत्य

जल तत्व वायु एवं अग्नि तत्व के संयोग से उत्पन्न होता है।

(ख) जल चिकित्सा सदैव रोगी को भोजन कराने के उपरान्त ही देनी चाहिए।

(ग) गर्म जल का अधिक लम्बे समय तक प्रयोग करने से माँसपेशियों का स्वाभाविक बल (Muscle tone) भी बढने लगती है।

(घ) गर्म जल से उपचार के बाद ठण्डे जल से उपचार अवश्य देना चाहिए।

(ड) जल चिकित्सा के अन्तर्गत ठण्डे जल से उपचार प्रारम्भ करते हुए गर्म जल के प्रयोग के साथ उपचार समाप्त करना चाहिए।

2- रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

इस सृष्टि में सर्वप्रथम ईश्वरीय शक्ति से तन्मात्रा उत्पन्न हुई।

(ख) जल तत्व में का अत्यन्त विशिष्ट गुण होता है।

जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा

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(ग) भोजन के पाचन, अवशोषण एवं उत्सर्जन की क्रिया में भूमिका निभाता है। तत्व महत्वपूर्ण

(घ) फादर सेबस्टियन नीप द्वारा रचित पुस्तक पुस्तक है। जल चिकित्सा की एक श्रेष्ठ

(ड) जल चिकित्सा के अन्तर्गत के प्रयोग से तंत्रिकाओं को बल मिलता है।

3- एक शब्द में उत्तर दीजिए

(क) शरीर किस तत्व के माध्यम से अपने अन्दर स्थित विषाक्त पदार्थों को निष्कासित

करते

हुए शुद्धता एवं स्वच्छता को धारण करता है ?

भूत शब्द संस्कृत की किस धातु से उत्पन्न होता है ?

शरीर चिकित्सकों के अनुसार मानव शरीर का कितने प्रतिशत भाग जल तत्व ही है ?

स्थूलता के आधार पर जल तत्व कौन सा स्थूलतम् तत्व है ?

गर्म जल का प्रयोग शरीर के किस भाग पर नही करना चाहिए ?

3-बहुविकल्पीय प्रश्न -

(क) प्राकृतिक चिकित्सा में जल को किस रुप में प्रयोग किया जाता है -

(a) सुपर मेडिसन

(b) एंटी बायोटिक मेडिसन

मेडिसन ।

(c) स्टीरॉइड मेडिसन

(d) एनल्जेसिक

(ख) जल तत्व की उत्पत्ति किस तत्व के विकार का परिणाम है

(a) पृथ्वी तत्व

(b) वायु तत्व

(c) अग्नि तत्व

(d) आकाश तत्व ।

(ग) जल तत्व में किस गुण का अभाव होता है -

(a) शब्द (Sound)

(b) गन्ध (Smell)

(c) स्पर्श (Touch)

(d) रस (Taste) ।

(घ) चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार मानव अस्थि का कितना प्रतिशत भाग जल तत्व होता है -

(a) 25

(c) 70

(b) 50

(ड) किस प्रकार के रोगियों को गर्म जल का उपचार नही देना चाहिए-

रोगियों

(a) हृदय रोगियों

(b)

(d) 10

उच्च रक्तचाप

(c) मानसिक तनाव से ग्रस्त

(d) उपरोक्त सभी

1.7 सारांश-

प्रिय पाठकों, प्रस्तुत इकाई का प्रारम्भ पंचतत्वों (पंचमहाभूतों) के परिचय से किया गया है। इकाई के प्रारम्भ में ही पंचतत्वों की उत्पत्ति के कम को समझाते हुए इनकी तन्मात्राओं को स्पष्ट किया गया है। यहां पर स्पष्ट किया गया है कि जल तत्व अग्नि तत्व के विकार का परिणाम है जिसकी उत्पत्ति वायु तत्व एवं अग्नि तत्व के संयोग से होती है। इस संदर्भ में

जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा

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वैज्ञानिक प्रयोग का उदाहरण भी दिया गया है। इकाई में आगे जल तत्व का परिचय वैदिक कर्मकाण्ड के ग्रन्थों अर्थात वेदों एवं उपनिषदों के आधार पर दिया गया है। तत्पश्चात जल तत्व की अवधारण को स्पष्ट करते हुए समझाया गया है कि जिस प्रकार जल तत्व पृथ्वी के 70 प्रतिशत भाग में फैला होता है उसी प्रकार मानव शरीर का 70 प्रतिशत भाग यह जल तत्व ही होता है। शरीर में इस तत्व की सम अवस्था स्वास्थ्य एवं इस तत्व की विषम अवस्था रोग कहलाती है।

इकाई में स्पष्ट किया गया है कि आधुनिक काल में जल चिकित्सा के अन्तर्गत जल को एक महाऔषधि के रुप में प्रयोग किया जाता है। शरीर के तंत्रों से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के रोगों को दूर करने में जल तत्व का प्रयोग लाभकारी भूमिका वहन करता है। रोगोपचार में यह तत्व विशेष लाभकारी प्रभाव रखता है। जिससे इस तत्व के महत्व का ज्ञान प्राप्त होता है। अन्त इस तत्व के प्रयोग अर्थात जल चिकित्सा के अन्तर्गत ध्यान रखने योग्य प्रमुख सावधानियों एवं महत्वपूर्ण तथ्यों को स्पष्ट करते हुए इकाई को पूर्ण किया गया है।

1.8

पारिभाषिक शब्दावली-

तन्मात्रा

तत्व का अपना विशिष्ट अथवा मूल गुण

अवधारणा

विषय का आधार

पुनरुथान

एक बार लुप्त हाने के पश्चात पुन व्यवहार अथवा

प्रचलन में आना

परिरक्षक

खाने के पदार्थों में सडन को रोकने के लिए प्रयुक्त

होने वाला द्रव्य

विकार

रोग अथवा बिमारी

वृहद शास्त्र

विशाल ज्ञान विज्ञान के ग्रन्थ

1.9 अभ्यास प्रश्नों के उत्तर

क. सत्य

क. शब्द

क.

जल

क. a

ख. असत्य

ख. शुद्धिकरण


भू

ख. C

ग.

असत्य

ग. जल

ग.

70

ग. b

घ. सत्य

घ. My Water Cure

घ. दूसरा

घ. a

ड. असत्य

ड. ठण्डे जल

ड.

गर्दन के ऊपर

ड. d

1.10 संदर्भ ग्रन्थ सूची

1. प्राकृतिक आयुर्विज्ञान

डॉ० राकेश जिन्दल, आरोग्य सेवा प्रकाशन, मोदी

नगर (उ०प्र०) ।

. प्राकृतिक चिकित्सा डॉ० टी० एन० श्रीवास्तव, मैत्रेयी प्रकाशन, नई दिल्ली।

जल एवं पृथ्वी तत्व चिकित्सा

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3. प्राकृतिक चिकित्सा रामगोपाल शर्मा, प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली।

4. प्राकृतिक उपचार की विधियाँ डॉ० राजीव रस्तोगी, पापुलर बुक डिपो जयपुर।

5. जल चिकित्सा डा० आर० एस० अग्रवाल, डा० एन० के अग्रवाल, मनोज पब्लिकेशन्स, दिल्ली 6।

6. Naturopathy the Holistic Healer - Dr. Satish Bajaj, Nirmaya Naturopathy, Delhi.

1.11 निबन्धात्मक प्रश्न

1 जल तत्व की सविस्तार व्याख्या किजिए।

2. जल तत्व की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए इसके महत्व पर प्रकाश डालिए

3. । वर्तमान काल में जल चिकित्सा के महत्व एवं इसके प्रयोग की प्रमुख सावधनियाँ सविस्तार लिखिए।

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