वात , पित्त और कब दोष का प्रधान निवास
वात , पित्त और कब दोष का प्रधान निवास
वात दोष का प्रधान निवास पक्वाशय माना गया है, इसलिए बड़ी आँत से जुड़ी सभी क्रियाओं पर वात का सीधा प्रभाव रहता है। मल का निर्माण, उसका संचय और निष्कासन वात के नियंत्रण में होता है। जब वात अपने स्वाभाविक स्थान पर संतुलित रहता है तब आंतों की गति सामान्य रहती है, परंतु वात के बढ़ते ही कब्ज, गैस, पेट फूलना और अनियमित मल त्याग जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं। कमर, नितंब, जांघ और पैरों में वात की प्रधानता बताई गई है, इसी कारण इन भागों में दर्द, अकड़न, झनझनाहट, नसों में खिंचाव और कमजोरी अधिक दिखाई देती है। हड्डियाँ और जोड़ वात के विशेष क्षेत्र हैं, क्योंकि अस्थि धातु में शुष्कता और कठोरता होती है। जोड़ों का चरमराना, चलने में कष्ट और वृद्धावस्था में होने वाली समस्याएँ वात वृद्धि का संकेत मानी जाती हैं। कान भी वात का आश्रय है, इसलिए सुनाई देने की क्षमता, संतुलन और कानों में सीटी जैसी आवाज़ें वात विकृति से जुड़ी होती हैं। त्वचा का स्पर्श ज्ञान वात द्वारा संचालित होता है, अतः सुन्नता, संवेदना का कम होना या अधिक हो जाना वात असंतुलन के लक्षण बनते हैं।
पित्त दोष का मुख्य क्षेत्र आमाशय के नीचे से लेकर छोटी आँत तक माना गया है, जहाँ पाचन और अवशोषण की सबसे महत्वपूर्ण क्रियाएँ होती हैं। भोजन को पचाकर रस में बदलने का कार्य पित्त करता है। यकृत पित्त का प्रमुख केंद्र है, क्योंकि वहीं रक्त का शोधन और निर्माण होता है। इसी कारण पीलिया, अम्लता, रक्त विकार और त्वचा रोगों में पित्त की भूमिका विशेष मानी जाती है। प्लीहा और रक्त पित्त के आश्रय स्थल हैं, इसलिए अधिक गर्मी, जलन, फोड़े-फुंसी और चिड़चिड़ापन पित्त वृद्धि से जुड़ा होता है। आँखें पित्त का विशिष्ट स्थान हैं, क्योंकि दृष्टि का तेज अग्नि तत्व पर निर्भर करता है। आँखों में जलन, लालिमा, सूखापन या धुंधलापन पित्त के असंतुलन को दर्शाता है। त्वचा का रंग, शरीर की प्राकृतिक ऊष्मा और पसीना भी पित्त द्वारा नियंत्रित होते हैं।
कफ दोष का प्रधान निवास वक्ष स्थल बताया गया है, जहाँ हृदय और फेफड़े स्थित होते हैं। यह दोष शरीर को स्थिरता, चिकनाहट, बल और सहनशक्ति प्रदान करता है। फेफड़ों में नमी और श्वसन मार्ग की रक्षा कफ के कारण संभव होती है, इसलिए खांसी, बलगम और श्वास संबंधी विकार कफ वृद्धि से जुड़े होते हैं। सिर और मस्तिष्क में कफ का वास मानसिक स्थिरता, स्मरण शक्ति और धैर्य को बनाए रखता है। अत्यधिक कफ होने पर आलस्य, भारीपन और एकाग्रता की कमी देखी जाती है। गला, मुख और साइनस कफ के प्रमुख क्षेत्र हैं, इसलिए जुकाम, गले में कफ जमना और आवाज़ भारी होना इसी दोष के असंतुलन से होता है। आमाशय का ऊपरी भाग भी कफ का स्थान माना गया है, जहाँ यह भोजन को नम और सुरक्षित रखता है।
आयुर्वेद में यह भी बताया गया है कि यद्यपि वात, पित्त और कफ के अलग-अलग प्रधान स्थान हैं, फिर भी ये तीनों दोष पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से व्याप्त रहते हैं। एक दोष की विकृति दूसरे दोषों को भी प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए वात के बढ़ने से पित्त सूख सकता है और कफ क्षीण हो सकता है। इसी प्रकार कफ की अधिकता से पाचन अग्नि मंद पड़ जाती है और पित्त प्रभावित होता है। इसलिए आयुर्वेद किसी एक अंग या लक्षण को अलग से नहीं देखता, बल्कि त्रिदोष के स्थान, गुण और परस्पर संबंधों के आधार पर शरीर की स्थिति को समझता है। जब दोष अपने-अपने स्थानों पर संतुलित रहते हैं तब शरीर सहज रूप से कार्य करता है, मन स्थिर रहता है और रोग उत्पन्न नहीं होते।
आयुर्वेद में वात दोष को शरीर की समस्त गतियों का नियंत्रक माना गया है। चरक संहिता के अनुसार वात ही वह शक्ति है जो पित्त और कफ को भी उनके स्थान पर गतिशील रखती है। जब वात संतुलित रहता है तब श्वसन, संचार, स्नायु क्रिया, उत्सर्जन, मानसिक सक्रियता और इंद्रियों का समन्वय ठीक रहता है। किंतु जब वात दोष बढ़ जाता है, विशेषकर अपने स्वाभाविक स्थान से विचलित होकर अन्य धातुओं और स्रोतों में प्रवेश करता है, तब अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। वात का स्वभाव रूक्ष, शीत, लघु, चल, सूक्ष्म और खर होता है, इसलिए इसके बढ़ने से शरीर में शुष्कता, ठंडक, कंपन, दर्द और अस्थिरता प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
वात दोष बढ़ने का पहला और सबसे सामान्य प्रभाव स्नायु तंत्र पर पड़ता है। वात का मुख्य आश्रय स्थल पक्वाशय और नाड़ी तंत्र है। जब वात असंतुलित होता है तो नसों में खिंचाव, झनझनाहट, सुन्नता, अकड़न और ऐंठन उत्पन्न होती है। इसी कारण ग्रीवा शूल, कटि शूल, साइटिका, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, कमर दर्द और जोड़ों का दर्द वात विकारों में अत्यंत सामान्य है। जोड़ों में चरचराहट, बिना सूजन के तीव्र पीड़ा, सुबह उठते समय कठोरता और हलचल से दर्द का बढ़ना वात वृद्धि के स्पष्ट संकेत माने जाते हैं।
वात दोष बढ़ने से वात व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, जिन्हें आयुर्वेद में 80 प्रकार का बताया गया है। इनमें पक्षाघात (पक्षवात), अर्धांगवात, कंपवात, अपतानक (दौरे), धनुर्वात (टेटनस जैसी स्थिति), मन्यास्तंभ (गर्दन का जकड़ जाना) और अंगों का दुर्बल होना प्रमुख है। वृद्धावस्था में होने वाला कंपकंपी रोग, हाथ-पैरों का कांपना और संतुलन बिगड़ना भी वात दोष के प्रकोप से जुड़ा होता है, क्योंकि वृद्धावस्था स्वयं वात प्रधान अवस्था मानी गई है।
पाचन तंत्र पर वात वृद्धि का गहरा प्रभाव पड़ता है। वात के बढ़ने से जठराग्नि विषम हो जाती है, जिसे विषमाग्नि कहा जाता है। इसके कारण कभी तीव्र भूख लगती है और कभी बिल्कुल नहीं लगती, भोजन ठीक से पच नहीं पाता, गैस, पेट फूलना, डकार, कब्ज, आंतों में मरोड़ और शूल उत्पन्न होता है। वातज कब्ज में मल शुष्क, कठोर और कठिनाई से निकलने वाला होता है, साथ ही पेट साफ न होने का भाव बना रहता है। ग्रहणी विकार, इरिटेबल बाउल जैसी स्थिति और बार-बार पेट दर्द भी वात के असंतुलन से जुड़े होते हैं।
मूत्र और जनन तंत्र में भी वात दोष बढ़ने से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। बार-बार पेशाब आना, मूत्र में रुकावट, जलन के बिना दर्द, मूत्रकृच्छ्र और बस्ति शूल वातज विकार माने जाते हैं। पुरुषों में शीघ्रपतन, धातु दुर्बलता, नपुंसकता, लिंग में शिथिलता और स्त्रियों में मासिक धर्म की अनियमितता, अल्प प्रवाह, कष्टार्तव तथा गर्भाशय में शूल वात दोष से संबंधित माने गए हैं। वात के बढ़ने से शुक्र और आर्तव धातु का क्षय होता है, जिससे प्रजनन शक्ति प्रभावित होती है।
त्वचा और केशों पर भी वात वृद्धि के लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं। त्वचा का अत्यधिक शुष्क, खुरदुरा और फटा हुआ होना, समय से पहले झुर्रियां पड़ना, होंठों का फटना और त्वचा में चमक का अभाव वात प्रकोप का संकेत है। बालों का रूखा होना, झड़ना, समय से पहले सफेद होना और सिर की त्वचा में रूखापन भी वात दोष से जुड़ा होता है। वातज त्वचा रोगों में खुजली कम होती है पर शुष्कता और खिंचाव अधिक रहता है।
मानसिक स्तर पर वात दोष बढ़ने से चंचलता, भय, चिंता, अनिद्रा, अस्थिर विचार, एकाग्रता की कमी और अवसाद जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। आयुर्वेद में मन और वात का गहरा संबंध बताया गया है। अत्यधिक सोच, डर, तनाव, अनियमित दिनचर्या और नींद की कमी से वात और अधिक बढ़ जाता है, जिससे स्मृति भ्रम, घबराहट, बेचैनी और बार-बार मूड बदलने जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। वातज अनिद्रा में व्यक्ति को नींद आने में कठिनाई होती है और नींद हल्की रहती है।
हृदय और श्वसन तंत्र पर वात वृद्धि से हृदय में धड़कन का असंतुलन, घबराहट, सीने में खालीपन, बिना कारण थकान और सांस की अनियमितता हो सकती है। वातज श्वास में सांस सूखी, कष्टदायक और अनियमित होती है। कभी-कभी बिना कफ के सूखी खांसी भी वात दोष का लक्षण होती है।
वात दोष बढ़ने के कारणों में अत्यधिक उपवास, रूखा-सूखा भोजन, ठंडा भोजन, अधिक चलना, जागरण, चिंता, भय, शोक, अधिक मैथुन, असमय भोजन और ऋतु परिवर्तन प्रमुख हैं। विशेषकर वर्षा और शरद ऋतु में वात स्वाभाविक रूप से बढ़ने की प्रवृत्ति रखता है।
इस प्रकार वात दोष का असंतुलन केवल एक अंग तक सीमित न रहकर पूरे शरीर और मन को प्रभावित करता है। आयुर्वेद में वात को नियंत्रित करना इसलिए अत्यंत आवश्यक माना गया है, क्योंकि यदि वात संतुलन में आ जाए तो पित्त और कफ भी स्वतः नियंत्रित होने लगते हैं। वात वृद्धि से उत्पन्न रोग धीरे-धीरे शरीर को दुर्बल बनाते हैं, इसलिए समय रहते वात के लक्षणों को पहचानना और जीवनशैली में सुधार करना आयुर्वेदिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आयुर्वेद में शरीर का संतुलन तीन दोषों—वात, पित्त और कफ—पर आधारित माना गया है। जब इनमें से वात और पित्त दोनों एक साथ असंतुलित हो जाते हैं, तब शरीर में गति और गर्मी का असामान्य मेल बनता है। यही स्थिति वात-पित्त दोष वृद्धि कहलाती है। यह अवस्था साधारण नहीं होती, क्योंकि वात की शुष्कता और पित्त की उष्णता मिलकर शरीर, मन और पाचन तंत्र तीनों को प्रभावित करती है।
वात-पित्त के लक्षण
वात-पित्त बढ़ने पर शरीर में अंदरूनी जलन और बाहरी सूखापन एक साथ दिखाई देता है। सिर में भारीपन या तेज दर्द, चक्कर, आंखों में जलन, मुंह में छाले, बार-बार प्यास लगना, हाथ-पैरों में गर्मी और झनझनाहट, पेट में गैस, एसिडिटी, सीने में जलन, कब्ज या अनियमित मल त्याग, कमजोरी और अत्यधिक थकान आम लक्षण हैं।
त्वचा रूखी हो जाती है, कभी-कभी लाल चकत्ते या जलन होने लगती है। नींद कम आती है, मन बेचैन रहता है, छोटी-छोटी बातों पर क्रोध, घबराहट, डर और चिंता बढ़ जाती है। कई बार दिल की धड़कन तेज होना और शरीर में कंपन भी महसूस होता है।
वात-पित्त बढ़ने के प्रमुख कारण
लगातार उपवास या बहुत कम भोजन करना, अधिक तीखा, खट्टा, तला-भुना और मसालेदार आहार, ज्यादा चाय-कॉफी या नशीले पदार्थ, देर रात जागना, तेज धूप में अधिक रहना, मानसिक तनाव, अत्यधिक सोच-विचार, अनियमित दिनचर्या और कमजोरी वात-पित्त को बढ़ाती है।
अधिक यात्रा, ज्यादा बोलना, भूख दबाना, पसीना रोकना और शुष्क भोजन भी इस दोष को बिगाड़ने में सहायक होते हैं।
वात-पित्त शमन के घरेलू आयुर्वेदिक उपाय
धनिया पानी: 1 चम्मच साबुत धनिया 1 गिलास पानी में रातभर भिगो दें। सुबह छानकर खाली पेट पिएं। यह पित्त की गर्मी और वात की जलन को शांत करता है।
सौंफ: भोजन के बाद 1 चम्मच सौंफ चबाएं। चाहें तो ½ चम्मच सौंफ 1 कप पानी में उबालकर दिन में 1–2 बार लें।
देसी गाय का घी: रोज सुबह खाली पेट 1 छोटा चम्मच घी गुनगुने दूध या पानी के साथ। यह वात की रूखापन और पित्त की तीक्ष्णता दोनों को संतुलित करता है।
आंवला: 1 चम्मच आंवला चूर्ण सुबह या 20–30 मि.ली. ताजा आंवला रस पानी मिलाकर। यह शीतल, बलवर्धक और पित्तशामक है।
इसबगोल भूसी: रात को 1 चम्मच इसबगोल 1 कप गुनगुने दूध या पानी के साथ लेने से कब्ज और आंतों की गर्मी कम होती है।
नारियल पानी: दिन में 1 बार ताजा नारियल पानी शरीर की जलन और कमजोरी दूर करता है।
चंदन या गुलाब जल: 1–2 बूंद गुलाब जल पानी में मिलाकर दिन में 1 बार लेना या माथे पर लगाना मानसिक अशांति में लाभकारी है।
आहार और दिनचर्या का महत्व
वात-पित्त में हल्का, सुपाच्य और शीतल भोजन सर्वोत्तम माना गया है। चावल, मूंग दाल, लौकी, तोरी, कद्दू, खीरा, दूध, छाछ और सीमित मात्रा में मिश्री उपयोगी होते हैं। बहुत गरम, खट्टा, बासी और तला भोजन से दूरी रखना आवश्यक है।
समय पर भोजन, पर्याप्त नींद, शांत वातावरण और नियमित दिनचर्या अपनाने से वात-पित्त धीरे-धीरे स्वाभाविक संतुलन में आने लगता है।
इसे सेव कर सुरक्षित कर लें, ऐसी पोस्ट कम ही आती है..
वात पित्त कफ के दोष तीनों को संतुलित करे इस आयुर्वेदिक उपाय से...अंत तक जरुर पढ़े
वात पित्त और कफ के दोष:-
पोस्ट को धयान से 2 बार पढ़े
शरीर 3 दोषों से भरा है
#वात(GAS) -लगभग 80 रोग
#पित्त(ACIDITY)- लगभग 40 रोग
#कफ(COUGH) -लगभग 28 रोग
यहां सिर्फ त्रिदोषो के मुख्य लक्षण बतये जायेगे और वह रोग घरेलू चिकित्सा से आसानी से ठीक होते है
सभी परहेज विधिवत रहेंगे
💙जिस इंसान की बड़ी आंत में कचड़ा होता है बीमार भी केवल वही होता है
💙एनीमा एक ऐसी पद्धति है जो बड़ी आंत को साफ करती है और किसी भी रोग को ठीक करती है
💚संसार के सभी रोगों का कारण इन तीन दोष के बिगड़ने से होता है
वात(#GAS) अर्थात वायु:-💛
--शरीर मे वायु जहां भी रुककर टकराती है, दर्द पैदा करती है, दर्द हो तो समझ लो वायु रुकी है
--पेट दर्द, कमर दर्द, सिर दर्द, घुटनो का दर्द ,सीने का दर्द आदि
--डकार आना भी वायू दोष है
--चक्कर आना,घबराहट और हिचकी आना भी इसका लक्षण है
कारण:-
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--गैस उत्तपन्न करने वाला भोजन जैसे कोई भी दाल आदि गैस और यूरिक एसिड बनाती ही है
--यूरिक एसिड जहां भी रुकता है उन हड्डियों का तरल कम होता जाता है हड्डियां घिसना शुरू हो जाती है ,उनमे आवाज आने लगती है, उसे डॉक्टर कहते है कि ग्रीस ख़त्म हो गई, या फिर स्लिप डिस्क या फिर स्पोंडलाइटिस, या फिर सर्वाइकल आदि
--प्रोटीन की आवश्यकता सिर्फ सेल्स की मरम्मत के लिए है जो अंकुरित अनाज और सूखे मेवे कर देते है
--मैदा औऱ बिना चोकर का आटा खांना
--बेसन की वस्तुओं का सेवन करना
--दूध और इससे बनी वस्तुओं का सेवन करना
-आंतो की कमजोरी इसका कारण व्यायाम न करना
निवारण:-
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--अदरक का सेवन करें,यह वायु खत्म करता है, रक्त पतला करता है कफ भी बाहर निकालता है, सोंठ को लेकर रात में गुनगने पानी से आधा चम्मच खायेँ
--लहसुन किसी भी गैस को बाहर निकालता है,
यदि सीने में दर्द होने लगे तो तुरन्त 8-10 कली लहसुन खा ले, ब्लॉकेज में तुरंत आराम मिलता है
--लहसुन कफ के रोग और टीबी के रोग भी मारता है
--सर्दी में 2-2 कली सुबह शाम, और गर्मी में 1-1 कली सुबह शाम ले, और अकेला न खायेँ सब्जी या फिर जूस , चटनी आदि में कच्चा काटकर डालकर ही खायेँ
--मेथीदाना भी अदरक लहसुन की तरह ही कार्य करता है
प्राकृतिक उपचार:-
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गर्म ठंडे कपड़े से सिकाई करे, अब उस अंग को पहले छुएं यदि वो गर्म है तो ठंडे सिकाई करे और वह अंग अगर ठंडा है तो गर्म सिकाई करे औऱ अगर न गर्म है और न ठंडा तो गर्म ठंडी सिकाई करे एक मिनट गर्म एक मिनट ठंडा
कफ(#COUGH):-
--मुंह नाक से आने वाला बलगम इसका मुख्य लक्षण है
--सर्दी जुखाम खाँसी टीबी प्लूरिसी निमोनिया आदि इसके मुख्य लक्षण है
--सांस लेने में तकलीफ अस्थमा आदि या सीढी चढ़ने में हांफना
कारण:-
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--तेल एव चिकनाई वाली वस्तुओं का अधिक सेवन
--दूध और इससे बना कोई भी पदार्थ
--ठंडा पानी औऱ फ्रिज की वस्तुये खांना
--धूल ,धुंए आदि में अधिक समय रहना
--धूप का सेवन न करना
निवारण:-
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--विटामिन C का सेवन करे यह कफ का दुश्मन है यह संडास के रास्ते कफ निकालता है, जैसे आवंला
--लहसुन, यह पसीने के रूप में कफ को गलाकर निकालता है
--Bp सामान्य हॉगा
--ब्लड सर्कुलेशन ठीक हॉगा
--नींद अच्छी आएगी
--अदरक भी सर्वश्रेष्ठ कफ नाशक है
प्राकृतिक उपचार
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--एक गिलास गुनगने पानी मे एक चम्मच नमक डालकर उससे गरारे करे
--गुनगने पानी मे पैर डालकर बैठे, 2 गिलास सादा।पानी पिये और सिरर पर ठंडा कपड़ा रखे, रोज 10 मिनट करे
--रोज 30-60 मिनट धूप ले
पित्त(#ACIDITY):-पेट के रोग
--वात दोष और कफ दोष में जितने भी रोग है उनको हटाकर शेष सभी रोग पित्त के रोग है, BP, शुगर, मोटापा, अर्थराइटिस, आदि
--शरीर मे कही भी जलन हो जैसे पेट मे जलन, मूत्र त्याग करने के बाद जलन ,मल त्याग करने में जलन, शरीर की त्वचा में कही भी जलन,
--खट्टी डकारें आना
--शरीर मे भारीपन रहना
कारण:-
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--गर्म मसाले, लाल मिर्च, नमक, चीनी, अचार
--चाय ,काफी,सिगरेट, तम्बाकू, शराब,
--मांस ,मछली ,अंडा
--दिनभर में सदैव पका भोजन करना
--क्रोध, चिंता, गुस्सा, तनाव
--दवाइयों का सेवन
--मल त्याग रोकना
--सभी 13 वेग को रोकना जैसे छींक, पाद, आदि
निवारण
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--फटे हुए दूध का पानी पिये, गर्म दूध में नीम्बू डालकर दूध को फाड़े, वह पानी छानकर पिए, पेट का सभी रोग में रामबाण है, सभी प्रकार का बुखार भी दूर करता है
--फलो व सब्जियों का रस, जैसे अनार का रस, लौकी का रस, पत्ता गोभी का रस आदि
--निम्बू पानी का सेवन
प्राकृतिक उपचार
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--पेट को गीले कपड़े से ठंडक दे
--रीढ़ की हड्डी को ठंडक देना, लकवा इसी रीढ़ की हड्डी की गर्मी से होता है, गीले कपड़े से रीढ़ की हड्डी पर पट्टी रखें
--व्यायाम ,योग करे
--गहरी नींद ले
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