डॉ. बीआरसी
कैंसर का इलाज संभव है
एक छोटा सा लेखन, हालांकी ये बहुत विशाल विषय है. कैंसर, कैंसर एक गंभीर बीमारी है, जो तब होती है जब शरीर की कोशिकाएँ (cells) अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. आमतौर पर, हमारे शरीर में एक प्रणाली होती है, जो कोशिकाओं को बताती है कि कब बढ़ना है और कब रुकना है.
कैंसर कई प्रकार के होते हैं, जैसे स्तन कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, रक्त कैंसर, कुछ कैंसर धीरे-धीरे बढ़ते हैं, जबकि कुछ बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं. इसलिए कैंसर का जल्द पता लगाना बहुत ज़रूरी है, कुछ लोगों को यह बीमारी धूम्रपान, अत्यधिक शराब पीने, बहुत अधिक जंक या प्रसंस्कृत भोजन आदि जैसी अस्वास्थ्यकर आदतों के कारण होती है, यह जीवनशैली विकल्पों, पर्यावरण और अन्य कारकों से उत्पन्न हो सकता है.
आज से कुछ साल पहले कैंसर जैसी बीमारी का नाम बहुत कम सुनने को मिला था, लेकिन आज ये एक आम बीमारी का रूप ले चुका है, सिर्फ भारत में ही नहीं, कई देशों में भी लोग इसके मरीज़ हैं, ऐसे में मरीज़ को और बीमार किया जाता है, कई तरह की 'सर्जरीस' और 'टेस्ट' से, जिस से कैंसर कम नहीं बल्कि और है, तो ऐसे में स्वस्थ जीवन जीने से कैंसर का खतरा कम हो सकता है, फल और सब्ज़ियाँ खाना, सक्रिय रहना, एक मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली आपके शरीर को बीमारियों से लड़ने में मदद करती है.
डॉ. बीआरसी कहते हैं, गंभीर से गंभीर बीमारी का इलाज आप ख्द्र घर बैठे कर सकते है., सबसे पहले कैंसर होता क्यों है? ऐसा नहीं है कि कैंसर अचानक से हो गया है, कैंसर कोशिकाएं हर किसी के शरीर में होती ही हैं, लेकिन वो कब सक्रिय होती हैं, या नियंत्रण से बाहर होती हैं, जब उन्हें सही खान पान नहीं मिलता है, और ये सही खान पान का ज़िम्मेदार कौन होता है? आप खुद.
आज कल के आधुनिक जीवन शैली में हम इतने व्यस्त हो चुके हैं, हम ये नहीं सोच रहे कि क्या स्वस्थ है हमारे शरीर के लिए और क्या नहीं, हमें बस तत्काल समाधान, या परिणाम चाहिए, चाहे वो भोजन से संबंधित हो या उपचार से संबंधित हो आदि. क्या हम एक स्वस्थ जीवन शैली जी रहे हैं, जो हमारे शरीर को 'सपोर्ट' करता है? नहीं, बिलकुल नहीं. हमें चाहिए तत्काल भोजन, चाहे वो 'पैक्ड फुड' हो, चाहे वो 'प्रोसेस्ड फूड' हो, चाहे वो पशु आहार हो, 'डेयरी' उत्पाद हो, चाहे वो 'प्लास्टिक' में 'पैक' हुआ महीनो से पड़ा हुआ भी क्यों ना हो, हमें बस स्वाद चाहिए, भले ही वो 'केमिकल' से बना हुआ ही क्यों ना हो, है ना. क्या ये हमारा शरीर केलिए स्वस्थ है, हम ये नहीं सोच रहे, और यहीं कारण है, मूल्य रूप से कैंसर जैसे गंभीर बीमारियों को बढ़ाव देने का.
तो ऐसे में क्या करना चाहिए? हमें उन चीज़ों का उपयोग नहीं करना है जो 'प्रोसेस्ड' हो, पशु उत्पाद हो, या 'डेयरी' उत्पाद हो, इन्हें स्वस्थ भोजन से बदलना होगा, जैसे कि भरपूर मात्रा में फल हो, सब्ज़ियाँ हो. और साथ में बहुत ही महत्वपूर्ण बात, अपने शरीर के 'रिदम' को 'सर्केडियन रिदम' को ठीक करना होगा, सुबह 8 बजे से पहले कुछ ना खाएं, और शाम 6 बजे के बाद कुछ ना खाएं, ऐसा करने से हमारी बेमारियां 'रिवर्स' होने लगती हैं, ठीक होने लगती हैं. बजाए इसके हम क्या करते हैं? हमे जाते हैं हमारे उस रास्ते पर जहां बीमारियों को कम नहीं, और बढ़ाया जाता है, 'कीमोथेरेपी' से, 'रेडिएशन' से, 'इम्यूनोथेरेपी' से, जी हाँ इस उपचार से कैंसर ठीक नहीं, बाल्की और फैलता, और बढ़ता जाता है, और एलोपैथी में इसका इलाज इतना महंगा कर दिया है, कि लोग इसे
'अफोर्ड' नहीं कर पाते, असल में इलाज तो कर नहीं पाते, और अंत में मरीज अपनी जान गवा देता है. एलोपैथी के इस जाल से बचें और अपने आप को जागरूक करें, और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज घर बैठे ठीक करें.
कैंसर का इलाज संभव है, जागरूकता फैलाकर और स्वस्थ जीवन जीकर, हम कैंसर से लड़ सकते हैं, और दूसरों को भी ऐसा करने में मदद कर सकते हैं.
नाज़िया परवीन
मानसिक स्वास्थ्य पर डॉ. बीआरसी
https://www.youtube.com/watch?v=ugSjmpgBK_Y&t=12s
एक बात समझ आई, कि बड़ी से बड़ी दिखने वाली बीमारी का, आसान से आसान इलाज कुछ तो है, बस ढूंढने वाली बात है. और मेरा सफर वहीं से शुरू हो गया, ये शुरुआत हुई आज से करीब 25 साल बोल सकता हूँ. 'आई एम 52 इयर्स ओल्ड' (I'm 52 years old), तो 25 साल पहले, जब मैं हार चुका था, और मैं समझ चुका था, कि 'इरिटेबल बाउल सिंड्रोम' (IBS-Irritable Bowel Syndrome) के साथ ही मेरी जिंदगी बितानी है,
< बचपन से, जब से होश संभाला तब से, यह वाली दिक्कत मुडो थी, और 'होम्योपैथी' (Homeopathy) हो, 'आयुर्वेद' (Ayurveda) हो, 'एलोपैथी' (Allopathy) हो, जितने तरह पद्धति, जितने तरह के नुस्खे, सारा कुछ आजमा के देखा. और ऐसे करते-करते जिंदगी के 25, 26 साल निकल गए, और फिर एक दिन मुझे समझ आया, कि भाई कोई इलाज नहीं आया 'इरिटेबल बाउल सिंड्रोम' का.
जब कोई इलाज है ही नहीं, इसका मतलब मुझे खुद ही ढूंढना पड़ेगा, तो मैंने 'आरएनडी' (R@D) करनी शुरू कर दी, 'रिसर्च' (research) करनी शुरू कर दी, 'रिसर्च पेपर' (research paper) पढ़ने लगे, और तब मुझे एक नुस्खा मिला, बड़ा 'सिंपल' (simple). और मैंने उसको अपनाया, और 15 दिन के अंदर मेरी जो 'इरिटेबल बाउल सिंड्रोम' (IBS-Irritable Bowel Syndrome) वो गायब हो गई, और गायब होने के अभी तो 25 साल हो भी गए इस चीज को, उसके बाद दोबारा वापस नहीं आई. दिमाग में छोटी सी बात आई, कि अगर ये जो छोटा सा नुस्खा अगर मुझे 'करेक्टली' (correctly) कोई बता देता बचपन में ही, तो मेरे जो बचपन से यहां तक की 'जर्नी' (journey) थी, वो बड़ा आराम से गुजरती.
तो वो नुस्खा भी मैं बता देता हूँ, 'इन माय केस आईबीएस' (In my case IBS) जिनको है, अगर वो सुन रहे हैं, देख रहे हैं इस कार्यक्रम को, तो वो ये 'ट्राई' (try) कर सकते हैं. 'द मोमेंट आई स्टॉप द डेरी प्रोडक्ट (The moment I stop the dairy product), दूध से बनी हुई हर वस्तु, और 'एनिमल प्रोडक्ट, मीट (animal product, meat), अंडा, मछली, उसके 15 दिन लगे मुझे पूरी तरह ठीक होने में, तो यह 'क्लू' (clue) है.
जीवन जीने का आधार, मेरे हिसाब से जब हम बोलते हैं, जीवन जी रहा है कोई, तो वो 'फिजिकली' (physically) जी रहा है, और 'मेंटली' (mentally) जी रहा है, दो 'लेवल' (level) पे हम जीते हैं. तो यानी कि 'फिटनेस' (fitness) दोनों 'लेवल' पे होनी चाहिए, तभी जाके हम मानेंगे, कि वो जीवन को पूरी तरह 'एंजॉय' (enjoy) कर रहा है. तो 'बेसिक' (basic) आधार तो ये है कि, जीवन को 'एंजॉय' करना है, 'एंजॉय' करने के लिए, दोनों 'लेवल' पे हम 'एंजॉय' करें, 'फिजिकली' भी हम 'हेल्दी' (healthy) रहें, और 'मेंटली' भी हम 'फिट' (fit) रहें.
अच्छा 'फिजिकली' कैसे इंसान अपने आपको 'हेल्दी' बोलें? कि अगर आप पूरे दिन भर में, पूरी 'एनर्जी' (energy) के साथ, पूरा दिन निकाल सकते हो, रात को अगर अच्छी नींद आती है, और अगर पूरे दिन भर में किसी तरह का 'पेन' (pain) नहीं है, कोई 'डिसकंफर्ट' (discomfort) नहीं है, कोई 'सिस्टम' (symptom) नहीं है, तो यानी कि आप 'हेल्दी' हो.।
अब मेंटल हेल्थ' (mental health) क्या है? सबको पता है, कि अगर हम चिंता में हैं, सारी उपलब्धियां होने के बाद भी, हमारा पेट भरा हुआ है, और हमारे पास छत है रहने को, हमारे दोनों हाथ हैं, दो पैर हैं, आंखें हैं, उन सब के बाद भी, अगर हम चिंता में हैं, और हमें लगता है कि, मेरे 'टाइम' (time) का काफी सारा 'परसेंट अबाउट' (percent about) 30 40% तो चिंता में ही चला जाता है, किसी ना किसी रूप में, यानी कि आप 'मेंटली' तो नहीं जी रहे हो, 'मेंटली' तो आप 'स्ट्रगल' (struggle) कर रहे हो.
देखिए हम इस जीवन में आए हैं 'एज ए ह्यूमन बीइंग, नॉट एज ए एनिमल' (As a human being, not as an animal). तो उसका 'बेसिक' (basic) फर्क ये है, 'एनिमल दे लिव इन द प्रेजेंट मोमेंट' (Animal they live in the present moment). 'एनिमल' अभी क्या खाने को मिलेगा, उतना ही है उनका 'लाइफ' (life) में, और कोई 'गोल' (goal) नहीं है, और उसके लिए कुछ भी करना पड़े, तो वो करेगा, 'दैट इज हाउ द एनिमल एनिमलिस्टिक बिहेवियर' (That is how the animal, animalistic behavior) इसे बोलते हैं.
और इंसान का मतलब होता है इंसानियत. इंसानियत की 'डेफिनेशन' (definition) ये है कि, उसकी 'एक्सिस्टेंस' (existence) की वजह से, उसके आसपास के लोग, जहां तक उसकी पहुंच है, उनको कुछ ना कुछ प्रभाव मिले, कुछ ना कुछ उनकी 'लाइफ' अच्छी 'लाइफ' में कुछ सुकून मिले. 'इफ यू कैन ऐड सम वैल्यू टू इट, दैट इज कॉल्ड हामैनिटी' (If you can add some value to it, that is called humanity). मुझे लगता है कि, 'दैट इज़ हाउ योर कंट्रीब्यूशन शुड बी' (That is how your contribution should be), एंड जब भी आप यह करेंगे, तो आपको अंदर से तसल्ली भी आएगी, या अंदर से खुशी मिलेगी, और 'दैट इज द बेसिस ऑफ योर लाइफ' (that is the basis of your life), कि आप अंदर से खुश हैं.
हमें समझना पड़ेगा कि, जैसा हम खाते हैं, वैसा हम बन जाते हैं. क्योंकि, जो भी आप खाते हैं, 'अल्टीमेटली' (ultimately) वो पेट
में जाता है. पेट में जाने के बाद, 'ब्लड स्ट्रीम' (blood stream) में जाता है, 'ब्लड स्ट्रीम' से वो आपके 'बॉडी' के एक-एक 'सेल' (cell) में जाता है. और 'बेस्ड ऑन दैट' (based on that), आपके 'बॉडी' में 'हॉर्मोनल चेंजेस' (hormonal changes)
आते हैं, 'एंड दैट इज वो हॉर्मोनल चेंजेस, दैट इज यू, दैट डिफाइन यू' (And that is hormonal changes, that is you, that define you), आप आप क्या है? आपकी 'आइडेंटिटी' (identity) क्या है? आपकी 'आइडेंटिटी' आपके बाल हैं, अपनी आंखें हैं, जैसा आप दिखते हैं, जैसा आप सोचते हैं, जैसा आप 'बिहेवियर' (behavior) करते हैं, ये जो आपका 'एक्शन' (action) है, जो आपका 'इनएक्शन' (inaction) है, 'दैट इज़ यू राइट' (that is you, right)? फिर आपका, आपका जो 'आइडेंटिटी' सिर्फ आपका नाम नहीं है, आपका जो पूरे दिन के 'एक्शनंस' हैं, 'हाउ यू लुक', 'हाउ यू थिंक, दैट बिकास योर आइडेंटिटी' (Actions, how you look, how you think, that becomes your identity). जो कि बाकी लोगों से भिन्न है, जिस तरह से आपके जो 'फिंगर प्रिंट' (finger print) है, वो भिन्न है. लेकिन इन सबको 'टोटैलिटी' (totality) में बनाता है, वो कौन है? जो आप 'कंज्यूम' (consume) करते हैं, हर 'फूड' (food) का 'डायरेक्ट आइदर पॉजिटिव और नेगेटिव इंपैक्ट' (Direct either positive or negative impact) पड़ता ही पड़ता है.
सोच का हमारी जिंदगी में पूरा प्रभाव पड़ता है. सोच से भी एक कदम आगे की बात करते हैं. जब हम कुछ सोचते हैं, 'एट एनी पॉइंट ऑफ़ टाइम' (at any point of time), कोई ये नहीं बोल सकता कि, मैं कुछ सोचता ही नहीं हूँ, 'यू आर ब्लैक', दैट कैन नॉट हैपन' (you are blank, that cannot happen), 'इवन' (even) हम सोचेंगे, हम 'ब्लैंक' है, तो भी हम सोच रहे हैं, कि हम 'ब्लैक' है. मान लो आपने अनजाने में कोई 'गोल' (goal) बनाया, कि मैं तो बड़ा 'एक्टर' (actor) बनना चाहता हूँ, 'हीरो' (hero) बनना चाहता हूँ. ऐसा बचपन में सभी लोग एक बार तो 'ड्रीम' (dream) करते हैं, है ना? क्योंकि, हम 'फिल्म' (film) देखते हैं, बचपन में लगता है, कि काश मैं भी ऐसा 'हीरो' होता. तो वो तो हो गई सोच के 'लेवल' (level) पे.
लेकिन कुछ बहुत दिल में ले जाते हैं, वो लगातार, और कुछ नहीं दिमाग में रहता. वो उसी चीज के ड्रीम' में रहते हैं, जागते हुए 'ड्रीम' में रहते हैं, और सोते हुए तो वैसे ही कुछ सपना आने लगता है. जब ऐसा होने लगता है जाने।
अनजाने, उसके जो 'एकशंस' (actions) होते हैं, वो उसके इर्द-गिर्द होने लगता है, उस तरह के 'न्यूज' (news) ज्यादा दिखाई देते हैं, उस तरह के लोग, रिसोर्सेज' (resources) को वो ज्यादा 'आइडेंटिफाई' (identify) करता है, और उस तरह के 'एक्शंस', उस तरह की 'एक्टिंग' (acting), उस तरह के जो 'कॉन्टेंट' (content) है, उस पे उसका ज्यादा 'इंटरेस्ट' (interest) होता है, ज्यादा समय लगाने लगता है, और 'अल्टीमेटली' उसका ओ 'गोल था, जो कि सोच 'इमैजिनेशन' (imagination) में बदल गई उसको, या तो वह 'अट्रैक्ट' (attract) कर रहा है, या उसकी तरफ वो खुद ही बढ़ रहा है, और यही वो लोग होते हैं, जो अपना 'गोल' को 'फुलफिल' (fulfill) कर पाते हैं.
अपना कंट्रोल अपने हाथ में ही है, चाहे हम 'फिजिकली' बनाए बात करें, 'हेल्थ' (health) की बात करें, 'मेंटल हेल्थ' (mental health) की बात करें, या अपने 'करियर' (career) की बात करें, अगर आप जिंदा हैं, और अगर आप खा सकते हैं, तो आप कुछ भी पा सकते हैं, जैसी जिंदगी चाहे, या जो भी जिंदगी आज भी आपकी है, यह वहीं जिंदगी जो आपने पिछले कुछ सालों में बनाई है, अनजाने में या जानबूझ के, जब आप कुछ नहीं भी कर रहे हैं, तब भी एक जिंदगी बना रहे हैं. 'एची इनएक्शन इज़ आल्सो एन एक्शन' (Every inaction is also an action). कुछ नहीं करना भी, आपने तय किया, कि मैं कुछ नहीं करूंगा, तो यही आपका 'एक्शन' हुआ.
इस दुनिया में अगर हम रहते हैं, तो दुनिया को कुछ देना भी है. कुछ ना कुछ कमियां होंगी, जो हम जैसे किसी लोगों ने पहले किया होगा, तो हम भी कमी का 'पार्ट' (part) ना बनके, कुछ ना कुछ इसको दोबारा से, 'रिसेटल' (resettle) करने का जो हम, कार्य करेंगे थोड़ा बहुत, 'दैट इज कॉल्ड माइंडफुलनेस' (that is called mindfulness), तब आपको लगेगा, कि मेरी जिंदगी में कुछ 'मीनिंगफुल' (meaning full) रहा है, दूसरों को दिखाने के लिए नहीं, अपने लिए, लेकिन, जब आपको पता है, कि मैं 'आई हैड मेड ये डिफरेंस इन द लाइफ ऑफ सम पीपल' (I had made a difference in the life of some people), आपको पता है, चाहे किसी और को ना पता हो, दैट गिब्स द कंप्लीटनेस इन द लाइफ' (that gives the completeness
in the life), कि हाँ, हम एक अच्छा 'लाइफ' जी रहे हैं, 'सो दैट इज कॉल्ड अ बैलेन्स लाइफ, व्हेन यू आर एबल टू बैलेंस एट दोज़ लेवल, एटलीस्ट यू स्टार्ट थिंकिंग ऑन दोज़ लेवल' (So, that is called a balance life, when you are able to balance at those level, at-least you start thinking on those level).
2 मिनट में नींद लाने का आसान तरीका
https://www.youtube.com/watch?v=dUbOGNUZCOA
3:49 से 11:29 तक
अब बात करते हैं 'साईस' (science) की, 'साइंस ऑफ स्लीप' (science of sleep) की, आप में से वो लोग जिनको दवाइयां खानी पड़ती हैं, 'स्लीपिंग पिल्स' (sleeping pills) खाने पड़ते हैं, नींद के लिए वो लोग जी 'इनसोनिया' (insomnia) के 'पेशेंट्स' (patients) हैं, उनके लिए पांच 'स्टेप' (Five steps) बहुत ही इंपीटेंट' है, महत्वपूर्ण है.
अथ इस साईस ऑफ स्लीप' का इस 'केव (pointing to cave on his back) से क्या ताल्लुक है? पहले हम 'केच' की थोड़ी सी बात कर लेते हैं. अक्सर हमने सदियों से सुना है, ऋषि मुनिका फेवरेट प्लेस' (favorite place) होता था गुफा, गुफा के अंदर बैठ के मेडिटेशन' (meditation) करने का, और कहीं से कोई सूरज की रोशनी आएगी, इस तरह का एक 'फेवरेट' जगह ची चुनते थे.
लेकिन 'इमैजिन' (imagine) कीजिए आपको इस तरह के गुफा में हम भेज दें, और पीछे जो 'लाइट' (Daght) का 'सोर्स' (source) है, 'सन रेज' (sun rays) है, उसको हम 'ब्लॉक' (block) कर सो हैं, यानी कि, एक अंधेरी गुफा, और ऐसे गुफा में अगर एक 'टॉर्च' (torch) पकड़ा दें, और बोलें, कि इसमें रहना है, तो अब आपके 'बाँडी' (body) में क्या 'चेंजेस' (changes) आएंगे उसकी बात तो हम किसी और "वीडियो' (video) में करेंगे, लेकिन आपकी नींद में क्या बदलाव आएंगे, इस पे बहुत सारे एक्सपेरिमेंट (experiment) किए गए, पिछले 50 सालों में,
और बार बार यह पाया गया कि, अगर आपके 'बॉडी' को, और आपकी आंखों को, 'सन रेज' का 'क्लू' (clue) ना मिले, 'ब्लीक' कर दिया जाए, तो आपका जी 'स्नीप साइकिल' (sleep cycle) है, आपका जो 'है एंड नाइट' (day and night) का 'साइकिल' है, वो धीरे-धीरे बदलने लगता है, आपका 'सर्केडियन क्लॉक' (circadian clock) बदलने लगता है
मतलब ये 'ओवर द पीरियड ऑफ सम्म टाइम' (over the period of sometime) अगर आप 'डार्कनेस' (darkness) में रहते हैं, एक ऐसी जगह रहते हैं, जहां ये सूरज की रोशनी नहीं मिलती, जब भी आपको रोशनी चाहिए, आपके पास अपना 'टॉर्च' है, या अपना 'लाइट' है, 'लाइटिंग सिस्टम' (lighting system) है, तो धीरे-धीरे आपका 'बॉडी 24 आवर्स' को, '48 आवर्स' में 'कन्वर्ट' (convert) कर देता है. यानी कि आपका एक दिन लगभग 48 'आवर्स' का होने लगता है. यानी कि 24 घंटे आप सोते हैं, और 24 घंटे आप जग के काम करते हैं, तो यानी कि अगर जिसको बहुत सौना है, उसका 'बेस्ट आईडिया' (best idea) है कि, 'ब्लॉक द सनलाइट एंड यू विल स्लीप फॉर 24 आवर्स, एंड यू विल वर्क फॉर 24 आवर्स' (block the sun light and you will sleep for
24 hours, and you will work for 24 hours), लेकिन सौर, मैं इसकी मशवरा नहीं देता हूं, क्योंकि 'सनलाइट' के 'ब्लीक' होने से हमारे 'थोडी का 'सर्केडियन रिदम' (circadian rhythm) बिगड़ जाता है, और जिससे 'कैंसर, हार्ट डिजीज, (cancer, heart disease) बहुत सारी बीमारियां आने लगती हैं.
1 हम बात करते हैं कि, 'हाउ टू गेट ए गुड नाइट स्लीप' (how to get a good night sleep). यहां पे पहला 'रूल' (rule), पहला 'स्टेप' (step), जितना ज्यादा 'ब्राइट डे लाइट' (bright day light) में रहेंगे, उतनी अच्छी रात की नींद होगी. यानी कि दिन में कोशिश करना है खिड़की पर्दे खोल दें, या किसी बंद कमरे में है तो, 'लाइट्स' ज्यादा से ज्यादा हो, जितना ज्यादा 'लाइट एक्सपोजर' (light exposer) दिन में होगा, उतनी अच्छी नींद रात को होगी, यह तो हो गया पहला नियम.
बात करते हैं दूसरे नियम की, ये बड़ा 'इंटरेस्टिंग' (interesting), हर रात आपके सोने से पहले, आपका 'बाँडी' खुद बा खुद अपना 'ब्लड प्रेशर' (blood pressure) थोड़ा सा 'द्विप' (dip) करता है, 10% से 20% और शरीर का तापमान थोड़ा सा 'ठिप' करता है, लगभग आथा 'डिग्री' (degree). जब ये दोनों चीजें होती हैं, तो 'एज ए रिजल्ट ऑफ दट बॉडी प्रोडांस' (as a result of that body produce) करता है एक 'हार्मोन (hormone), 'हार्मोन कॉल्ड 'मेलाटोनिन' (called melatonin), जिससे
आपको हर रात नौंद आती है, यानी कि हर रात आपका 'बॉडी' बिना भूले ये दो बदलाव करता है. लेकिन किसी एक 'पर्टिकुलर' (particular) रात, और जिनको रोज ही नींद नहीं आती, तो उनके लिए हर रात शायद उनका 'बॉडी भूल जाता है, कि 'ब्लड प्रेशर' को थोड़ा 'डिप' करना, और 'टेंपरेचर' (temperature) को थोड़ा 'डिप' करना है, 'एज ए रिजल्ट' वो फिर 'इनसोम्निया' के 'पेशेंट' बन जाते हैं.
HOT 42°C
2 तो ऐसे में उन्हें क्या करना चाहिए, 'स्टेप टू' (step two), खुद बा खुद अपना 'ब्लड प्रेशर, खुद बा खुद अपना बॉडी टेंपरेचर' थोड़ा 'हिप' करने की कोशिश करनी चाहिए. उसके लिए बड़ा आसान 'टेक्नीक' (technique) है, 'स्टेप टू' ये है, एक बाल्टी लीजिए, बाल्टी में 42 डिग्री सेल्सियस का पानी रखिए, और जैसा आप 'वीडियो में देख रहे हैं, अपने दोनों पैर 42 डिग्री सेल्सियस वाले पानी में डाल दीजिए, और ऐसे आधे घंटे तक बैठिए, जब ऐसा आप करेंगे, तो आपका 'ब्लड प्रेशर' थोडा 'डीप' होगा, और 'टेंपरेचर बॉडी' का उल्टा थोड़ा बढ़ जाएगा, लेकिन जब ये आधे घंटे बाद आप बाल्टी से बाहर पैर कर लेंगे,
अपने दोनों पैर 42 डिग्री सेल्सियस वाले पानी में डाल दीजिए, और ऐसे आधे घंटे तक बैठिए
अब आपका 'टेंपरेचर' ओ बढ़ा हुआ था 'आर्टिफिशियली' (artificially) 'बिकीज ऑफ द हॉट वाटर' (because of the hot water), वो 'डीप' करने लगेगा. मतलब ये कि, अब 'बलह प्रेशर 'ऑलरेडी डीप' हो चुका है, 'एंड' आपका 'बॉडी टेंपरेचर' 'डीप' होने के 'प्रोसेस' (process) में है, 'परंड दट विल गिव यू इंडघूस द स्लीप' (and that will give you, induce the sleep). वो आपको 'स्लीप इंड्यूस' कर देगा, यह एक बहुत ही 'इंटरेस्टिंग स्ट्रेटेजी' (interesting strategy) है, यह स्ट्रेटेजी' हम अक्सर अपने 'पेशेंट्स' के साथ करते हैं, उनको सिखाते हैं हमारे हॉस्पिटल में, या फिर 'अदर वाइज आल्सो' तो यह हुआ 'स्टेप टू
अब बात करते हैं स्टेप श्री (Step three) की, 'स्टेप श्री इज एक्सरसाइज थिफोर 3 पीएम' (Exercise before 3 pm). दोपहर से पहले अगर 'एक्सरसाइज' का काम खत्म कर लेते हैं, ती रात की नींद अच्छी हो जाती है. दोपहर के बाद अगर 'एक्सरसाइज' करते हैं, तो 'यू में स्ट्रगल इन गेटिंग द स्लीप" (you may struggling in getting the sleep).
एक्सरसाइज बिफोर 3 पीएम
अब आते हैं स्टेप फोर' (Step Four), 'स्टेप फोर' सनसेट 4 (sunset) से पहले अपना 'डिनर फिनिश (dinner finish) कर ले, 'सनसेट' के बाद कुछ भी ना खाएं, खास तौर पर कैफीन' (caffeine), या कई तरह की दवाईयाँ 'बीटा ब्लॉकर' (Beta-blocker) आदि. क्योंकि वो 'इंटरफेयर' (interfere) करती है' विद द प्रोडक्शन ऑफ मेलाटोनिन' (with the production of melatonin), जिससे आपके नींद आने में दिक्कत आती है, अगर आप 'सनसेट' से पहले 'डिनर फिनिश' कर लेते हैं, तो आपकी रात की नींद बड़ी अच्छी हो सकती है.
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सनसेट' (sunset) से पहले अपना 'डिनर फिनिश' (dinner finish) कर लें.
'सनसेट' के बाद कुछ भी ना खाएं
5 और पांचवी और आखरी बात, रिस्ट्रिक्टेड बेड टाइम' (restricted bed time) जो हैबिचुअल' (habitual) जिनको सोने की दिक्कत है, 'इनमोनिया' की दिक्कत है, नीद की गोली लेनी पड़ती है, उनके लिए 'टाइम रिस्ट्रिक्टेड फॉर गोइंग टू द बेड (time restricted for going to the bed). 'बेड' पे जाने, और 'बेड' से उठने का 'टाइम रिस्टिक' कर दिया जाए 'फोर्सफुली' (forcefully), 'टू से अबाउट सिक्स आवर' (to say about six hour), ठीक से घंटे के लिए 'बेड' में जाएंगे, नींद आए ना आए, छ घंटे बाद जबरदस्ती उठना ही है. जब आप यह करेंगे, तीन चार पांच दिन के अंदर आपका 'बॉडी' का 'सर्केडियन क्लीवक' (circadian clock) ठीक होने लगेगा, और आप 'बेड' पे जाएंगे, और जाते ही बड़ी जल्दी से आपको नींद आने लगेगी, जब नींद आने लगेगी, तब आप वो जो 'टाइम रिस्ट्रिक्शन' किया था, उसको आप छोड़ दीजिए, यह बात हमें ध्यान रखनी पड़ेगी, कि हर इंसान का जो नींद की 'रिक्वायरमेंट' (requirement) है, उसके उम्र के हिसाब से, उसके काम के हिसाब से अलग-अलग होता है.
एक छोटा बच्चा, एक 'इन्फैन्ट' (infant) कई बार 15, 18, 20 घंटे तक भी सोता है. जो 'न्यूली बॉर्न' (newly born) होता है, 22 घंटे तक भी सोता है. जैसे जैसे हमारी उमर बढ़ती है, वैसे वैसे हमारी नींद की आवश्यकता घटती रहती है, लेकिन मान लो कोई 40 से 50 साल का इंसान है, उसको भी करीब आठ घंटे तो सोने की जरूरत होती ही है.
'इम्पॉर्टेट' (important) बातः तो खैर यह पांच महत्वपूर्ण 'पॉइंट्स' है, पांच महत्त्वपूर्ण 'स्टेप्स' है, फॉर गुढ़ नाइट स्लीप एक आखरी 'इम्पोर्टेट' (important) बात, बहुत ही 'इंटरेस्टिंग' (interesting) बात है. 'इट इज कॉल्ड व स्लीप गेट' (it is called the sleep gate), कभी याद कीजिए, ऐसा हुआ आपके साथ कि, अचानक एक 'पर्टिकुलर' (particular) दिन आपको नींद नहीं आ रही, फिर चाहे आप कितनी भी कोशिश कर लें, 'अल्टीमेटली' (ultimately) एक डेढ़ घंटे बाद, दो घंटे बाद ही नींद आती है, इसे कहते हैं 'स्लीप गेट'
एक बार 'स्लीप' का 'गेट' बंद हो गया, तो अगली बार जब खुलेगा, वी डेढ़ से दो घंटे से पहले नहीं खुलेगा, 'बिटवीन वन आवर 30 मिनट्स टू 2 आवर्स', जबकि ये आपको पता चल ही चुका है, तो उस डेढ़ दो घंटे में आप 'बेड' में 'स्ट्रगल' करते रह जाए, तो बजाय इसके, उठके कोई काम कर लिया, कोई किताब पढ़ लिया, कल
की कोई तैयारी कर ली, क्योंकि पता है कि अगला 'स्लीप गेट ओपन' होने वाला है, 'दैट इज बिटवीन वन आवर 30 मिनट्स टू 2 आवर्सः और उतने 'टाइम' के बीच में, आपको नींद आने लगेगी, आप 'बेड' में गए, और जाते ही आप सो गए, ती 'दिस इ साइंस ऑफ स्लीप' (This Is science of sleep).
इसके 'डिटेल' (detail) में जानना है, सारे 'एविडेंसेस' (evidences) देखने हैं, 'रिसर्व पेपर्स' (research papers) अगर आपको देखते है, 'यू कैन रीड माय बुक द सकैद्रियन डॉक्टर' (you can read my book the circadian doctor), यह 'बुक बेस्ट सेलर बुक' (best seller book) है, कई सारे 'ऑनलाइन स्टोर्स' (online stores) में 'अवेलेबल' (available) है, पूरे दुनिया भर के, लेकिन आप मेरे 'वेबसाइट' (website) से इसको 'फ्री डाउनलीड' (free download) कर सकते हैं.
डॉ. बिस्वरूप रॉय चौधरी
अनुवादः नाज़िया परवीन
100 बीमारियों का एक इलाज
https://www.youtube.com/watch?v= BTV7c1Wst4
4:10 तक
ती 'ट्यूमर' (tumor) 'बॉडी' (body) ने बनाया है, तो 'बॉडी' 'डिजील्य' (dissolve) करेगा 'स्टीन' (stone) 'बॉडी' ने बनाया है, 'बॉडी' 'डिजील्व' करेगा. अगर 'बॉडी' में 'ट्यूमर' बन ही गया है, 'बॉडी' में 'शुगर एक्स्ट्रा' (sugar extra) है ही, 'बीडी' में 'हार्ट' (heart) में कोई 'ब्लॉकेज' (blockage) आ ही गया है, तो अब क्या करें? उसको ठीक से निकालने के लिए क्या करें?
मैं एक एएजैम्पल' (example) दे के समझाता हूं.
गार्बेज बॉडी' के अंदर ही है
किसी के पास 'पेन' (pen) है रिफिल' (refill) वाला 'पेन', आप में से, दीजिए. अब देखिए, जो लोग 'एंजियोग्राफी' (angiography) कराते हैं, या जो लोग 'एंजियोप्लास्टी' (angioplasty) कराते हैं, तो 'एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी, में क्या होता है, एक कैथेटर' (catheter) या यूँ बोलिए, एक तार आपके 'ब्लड वेसल' (blood vessel) में डाल देते हैं. इतना तो आपको पता है, और अगर आपके कहीं पर भी कोई 'ब्लॉकेज" (blockage) है, तो 'ब्लॉकेज' टूट जाएगा, हट जाएगा, 'राइटः फिर एक वहां पर कोई 'स्टेंट' (stent) डाल देंगे, कोई रिंग (ring) डाल देंगे ती, ये आप ठीक हो गए ऐसा मानते हैं.
अब मानिए, इस तरह के तार, और ये आपका 'ब्लड वेसल' है, और अंदर एक्क 'ब्लॉकेज' है, अब जब ये बारबार जाएगा, तो वी क्या टूटेगा ता, यह तो बोलते ही है, अब दो 'गार्बेज' (garbage) टूट गया है, लेकिन गार्बेज बॉडी' के अंदर ही है ना इस वक्त भी, तो क्या होगा? वो 'ब्लड' में पूरे 'बॉडी' में घूमेगा, या घूमता है, और घूम के अक्सर वो 'ब्रेन' (brain) में अटकता है, अब होता है 'ब्रेन स्ट्रोक (brain Stroke).
ती जब भी आप सोचते हैं. डायग्रोज (diagnose) करके देख लेते हैं, 'एंजियोग्राफी' करा के देख लेते हैं, तो आप अपनी तैयारी कर रहे हैं 'ब्रेन
स्ट्रोक' करवाने की. जो लोग यहां पर 'साईस' के 'स्टूडेंट' (science student) है, या 'इंजीनियर' (engineer) है, जो लोग 'लॉजिकल (logical) सोच सकते हैं, एक गार्बेज ऑलरेडी' है, 'ब्लॉकेज' है, उसको ऐसे ऐसे बारबार करेंगे तो, टूटेगा या नहीं टूटेगा? या तो टूट जाएगा.
अगर वो टूट जाएगा, तो पूरे 'बॉडी' में वो 'ब्लड वेसल' के अंदर ही है ना, 'गार्बेज' बाहर तो निकला नहीं 'राइटः तो अब वो जहां भी जाके फसेगा, आपका वो वाला 'ऑर्गन' (organ) खराच होगा, काम नहीं करेगा, आपको दर्द होगा, 'पेन' (pain) होगा, मर जाएंगे, 'पैरालिसिस' (paralysis) हो जाएगा, कुछ ना कुछ हो जाएगा, लेकिन कभी भी, ये नहीं पता चलेगा, आपको बताएंगे नहीं, वो जो 'गार्बेज', 'एंजियोग्राफी' करने की कोशिश की गई थी, उसी की वजह से यह एक नया 'प्रॉब्लम' (problem) आ गई आपको,
तो 'गार्बेज' को 'बाँडी' से बाहर अगर आपको निकालना है, तो निकालने का रास्ता वहीं होना चाहिए जो कुदरत ने आपको दिया है, ना कि वह रास्ता, जो इंसान ने बनाया है, काटने छाटने का नहीं.
एग्लैम्पल' के तौर पे, किस तरह से 'गार्बेज' हमारे 'हॉस्पिटल' में हम निकालते हैं, आप घर जाके क्या करेंगे? अब देखिए, मान लीजिए यह पेड़ नहीं है, ये 'ट्यूमर' है, या ये 'कैंसर' (cancer) है, और यह बढ़ता जा रहा है, डॉक्टर बोल रहे हैं, 'ट्यूमर' इतना बढ़ गया है, ऐसा करते हैं, 'ट्यूमर' को काट देते हैं. तीचा है जी में 'ट्यूमर को, ये पते है. मैंने इसको काट दिया, ट्यूमर निकल गया, लेकिन अब क्या होगा? कुछ दिन बाद क्या 'ट्यूमर' खत्म हो जाएगा? यह पेड़ तो दोबारा से बढ़ेगा तो कभी भी 'सर्जरी' (surgery) से कोई भी बीमारी ठीक नहीं हो सकती, क्योंकि जड़ तो अभी भी है ना, जब भी आप 'स्टोन' को निकालेंगे, 'ट्यूमर' को निकालेंगे, पेड़ तो वहीं है, पेड़ को खाना तो मिल रहा है, वो ट्यूमरस ग्रोथ' (tumorous growth) का कारण वो ती वहीं का वहीं है.
तो जब भी आप सोचते हैं कि, 'ट्यूमर' को काट दें, हम को पल भर के लिए लगेगा, देखो ठीक हो गया, लेकिन, धीरे धीरे धीरे धीरे दोबारा से बढ़ेगा, इस बार और तेजी से बढ़ेगा, आप समझ रहे है. तो 'ट्यूमर' हो, या 'किडनी स्टोन' (kidney stone) हो, 'गॉल ब्लैडर स्टोन' (gall bladder stone) हो, तो आप अगर उनमें से है, कि 'सर्जरी' से कुछ कर लें, तो आप यह सोच रहे हैं, कि पेड़ ज्यादा बढ़ गया, तो मैं काट लू, और उम्मीद कर रहे है, कि दोबारा नहीं बढ़ेगा, तो आप कुछ ऐसे ही सोच रहे हैं फिर, जो कि 'इल्लॉजिकल' (ilogical) बात है.
तो करना क्या होगा? हम क्या करते हैं? अगर यह कैंसर' है, इसे कहते हैं, 'सौंड एंड सॉइल थ्योरी' (Seed and soil theory). 1895 मैं 'थ्योरी' लिख गई थी, और आज भी ये वैलिड' (valid) है, कि अगर ये 'कैसर है, अगर ये 'ट्यूमर' है, ये पेड़ को हम 'कैंसर' या 'ट्यूमर' मान रहे हैं, तो अगर मैं ये यहां से निकाल दूं कुछ दिन तक ऐसे ही रखा रहे, क्या ये उग सकता है? ट्यूमर' बढ़ सकता है? क्या होगा इसका? धीरे-धीरे ये सुख जाएगा, खतम हो जाएगा है ना. तो जो 'एनवायरनमेंट' (environment) है, जिस 'एनवायरनमेंट' पे वी 'ग्रो' कर रहा था, उस 'एनवायरनमेंट' को बदल दी, 'चेंज' (change) कर दो उस एनवायरमेंट' को. अगर आप ऐसा कर पाए, तो ट्यूमर "बॉडी' ने बनाया है, तो 'बॉडी डिजॉल्य' करेगा 'स्टोन बाँडी' ने बनाया है, 'बाँडी डिजॉल्व' करेगा, तो वो 'परमानेंट' (permanent) इलाज है.
डॉ. बिस्वरूप रॉय चौधरी
अनुवादः नाज़िया परवीन
चिकित्सा में एकीकृत सोच की आवश्यकता :
भारत में कोविड-19 टीकाकरण अभियान का एक महत्वपूर्ण विश्लेषण - डॉ. अमिताव बनर्जी
निमहंस बेंगलुरु शोध ने तंत्रिका संबंधी चिंताओं के बीच भारत में कोविड-19 टीकाकरण अभियान के गहन मूल्यांकन की तत्काल आवश्यकता को बल दिया है
जैसे-जैसे भारत कोविड-19 महामारी की तत्काल चपेट से बाहर निकल रहा है, उसके तेज़ और व्यापक टीकाकरण अभियान को लेकर चिंताजनक संदेह फिर से उभर रहे हैं, जिसकी वजह कोविड-19 टीकों और तंत्रिका संबंधी स्थितियों के बीच संबंध का सुझाव देने वाले नए शोध हैं। डॉ. अमिताव बनर्जी का विश्लेषण, "शॉट्स इन द डार्क", जन स्वास्थ्य नौति और टीका सुरक्षा के पारदर्शी पुनर्मूल्यांकन की तत्काल आवश्यकता बताता है।
डॉ. बनर्जी का विश्लेषण भारत में कौविड-19 टीकाकरण अभियान के दौरान उत्पन्न गंभीर चिंताओं को रेखांकित करता है। भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (आईसीएमआर) सहित शुरुआती अध्ययनों ने जोखिम को कम करके अनुसंधान आंका है। हालाँकि, जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने अचानक होने वाली मौतों को टीकाकरण से जोड़ा, तो लोगों में चिंता फिर से भड़क उठी, जिससे हृदय स्वास्थ्य संबंधी परा और सार्वजनिक ि वृद्धि
डॉ. बनर्जी का शोधपत्र सामूहिक टीकाकरण से संबंधित गंभीर दुविधाओं को उठाता है, खासकर स्वस्थ युवा लोगों में महामारी की बेहद कम मृत्यु दर (0-19 वर्ष के लिए 0.0003% और 69 वर्ष तक के लोगों के लिए 0.03-0.07%) को देखते हुए।
वह बताते हैं कि यूरोप में संधीय औषधि प्राधिकरण ने थक्के जमने की समस्याओं के बढ़ते जोखिम के कारण 50 वर्ष से कम आयु के लोगों के लिए कोविशील्ड (एस्ट्राजेनेका) टीके को रोकने की सिफारिश की थी, जबकि भारत में 85% लोग 50 वर्ष से कम आयु के हैं। हम देखते हैं कि जून 2021 तक, सीरो-सर्वेक्षण दिखा रहे थे कि 68% आबादी में प्राकृतिक एंटीबॉडी विकसित हो गई थी, जो उनके टीकाकरण की तुलना में तेज़ी से विकसित हो रही थीं, यही एक कारण था कि उन्होंने सवाल किया कि क्या टीकाकरण को लेकर अभी भी तत्परता की आवश्यकता है।
उनका विश्लेषण कई "खतरे के निशानों" की ओर इशारा करता है जिन पर शोध नहीं किया गया है, जिनमें टीकाकरण अभियान के साथ-साथ, विशेष रूप से युवा और स्वस्थ लोगों में, दिल के दौरे और हृदय संबंधी
समस्याओं के कारण अचानक होने वाली मौतों में असामान्य वृद्धि शामिल है। ये घटनाएँ अन्य अंतर्राष्ट्रीय रुझानों से मेल खाती हैं, जैसे मृत्यु दर में वृद्धि, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में टीकाकरण अभियान के साथ राष्ट्रीय मृत्यु दर का सहसंबंध। जुलाई के सप्ताहांत में बड़े पैमाने पर टीकाकरण के बाद 25-44 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों में अचानक होने वाली मौतों में 84% की वृद्धि देखी गई।
सरकारी अध्ययनों पर आलोचनात्मक दृष्टि डालते हुए, डॉ. बनर्जी के शोधपत्र में आई सी एम आर पर "जल्दबाज़ी में की गई प्रक्रियाओं" और यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षणों (आर सी टी) के बजाय निम्म्र-स्तरीय केस कंट्रोल अध्ययनों के लिए निशाना साथा गया है। उनका तर्क हैं कि डिज़ाइन की खामियों, जैसे कि नियंत्रण समूहों का ज़रूरत से ज्यादा मिलान, ने "संभावित टीकाकरण-संबंधी नुकसानों को छुपाया" हो सकता है, जिसके कारण यह
गलत निष्कर्ष निकला कि टीके अचानक होने वाली मौतों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
यह शोधपत्र बढ़ती रिपोर्टों, विशेष रूप से निमहंस बेंगलुरु के आंकड़ों, के आलोक में तत्काल ध्यान देने का आह्वान करता है, जिनमें कोविड-19 टीकों के संभावित तंत्रिका संबंधी प्रभावों की रिपोर्ट शामिल हैं। इस शोध पत्र में एक स्पष्ट "शोध कार्रवाई का आह्वान" जारी किया गया है, जिसमें टीकाकरण प्राप्त और टीकाकरण न प्राप्त समूहों की निरंतर निगरानी और बिना किसी टकराव के उचित, दीर्घकालिक अध्ययन करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है। विश्लेषण इस बात पर जोर देता है कि सरकारी अध्ययनों की गुणवत्ता और पारदर्शिता को लेकर चिंताजनक चिताएँ महत्वपूर्ण स्वास्थ्य मार्गदर्शन में "जनता के विश्वास को कम कर सकती हैं। रिपोर्ट में ज़ोर दिया गया है, "मानव जीवन आर्थिक हितों से ज्यादा महत्वपूर्ण है।"
डॉ. अमिताव बनर्जी सुझाव देते हैं, "एक राष्ट्र के रूप में, हमें इस बात का गहन मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि हमसे कहाँ गलती हुई, विज्ञान कैसे
भय के घेरे में आ गया, और अंततः इसकी कीमत किसे चुकानी पड़ेगी।" "हमारी जाँच इन मुद्दों को उजागर करती है और दर्शाती है कि चिकित्सा में और अधिक एकीकृत तर्क की कितनी आवश्यकता है, और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुरक्षा आकलन कितने बेहतर और पारदर्शी होने चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि और अधिक स्वास्थ्य आपदाएँ अतीत की गलतियों को न दोहराएँ, और हमारी चिकित्सा प्रणालियों में जनता का विश्वास बहाल हो।"
यह शोधपत्र जनता के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए आँकड़ों की सावधानीपूर्वक व्यवस्थित समीक्षा की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर जोर देता है और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों, टीकाकरण और प्रक्रियाओं से जुड़े कई मुद्दों को दर्शाता है जिन्हें चिकित्सा प्रणालियों में अखंडता और विश्वास बनाए रखने के लिए ध्यान में रखा जाना चाहिए।
क्या हम मृत भोजन खा रहे हैं?
https://www.instagram.com/reel/DNVZ4J5JCXm/?igsh=MXZqeGtqd3FmY2t1Yg==
सात्विक युथः जब आप घर में दाल बनाते हैं, तो उसको 'यल्लो' (yellow) करने के लिए क्या डालते हैं?
बच्चेः हल्दी,
सात्विक युथः हल्दी डालते हैं, INS-102 (आईएनएस-102) तो नहीं डालते हैं.
किसी भी खाने में 'फ्लेवर' (flavor) देने के लिए हम क्या डालते हैं?
बच्चे: 'स्पाइसेस' (spices).
सात्विक युथः मसाले डालते हैं, हैना. 'नेचर आइडेंटिकल फ्लेवरिंग सबस्टैन्स' (nature identical flavoring substances) तो नहीं डालते.
'सो रियल फूड और ब्रेड फूड' (So, real food and dead food) में यही अंतर है, उसकी 'इंग्रेडिएंट्स लेबल' (ingredients label) को आप पढ़ेंगे, तो आपको 'रिअलाइज' (realize) होगा, की 'डेड फूड' में 'आर्टिफिशियल इंग्रेडिएंट्स' (artificial ingredients) होते हैं.
'एंड ऑल ऑफ दीज़ प्रोडक्ट्स डॉट डिज़र्व टू बी कॉल्ड फूड, वॉट दे शुड बी कॉल्ड? (And all of these products don't deserve to be called food, what they should be called?).
बिस्वास
पत्रिका वर्ष 6 अंक 17 सितम्बर 1, 2025
30/62
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बच्चे: 'डेड फूड' (Dead Food).
सात्विक युथः 'एगजैकटली डेड फूड' (Exactly dead food).
सात्विकयुथ अनुवादः नाज़िया परवीन
पहनिए Zero Volt सैंडल और पाएं शरीर को नई ऊर्जा
होगए, आपके 'बॉडी' में 'लिटेरली इलेक्ट्रॉन' (literally electron) आने लगेगा, जिसको हम 'वॉल्ट मीटर से भी 'मेजर' कर सकते हैं, तो तब आपका 'जीरो चौल्ट' हो जाएगा.
'जीरो वॉल्ट' होने केलिए आपको जूते उतारने पड़ेंगे, लेकिन मुझे अपनी चप्पल उतारने नहीं
https://www.instagram.com/reel/DKohgmyN7rc/?igsh=MTZmYzBrdmo3eXRsYw==
जब इस चप्पल को पहन के मैं घांस में खड़ा हूँ, तो इस वक्त मेरी जी 'बॉडी' (body) की 'वोल्टेज' (voltage) है, 'दैट इज जीरो वॉल्ट' (that is zero volt). जबकि आपने जो जूते पहने हैं, तो आपकी 'बॉडी' की 'वोल्टेज' करीब 0.2, 0.4 ऐसा कुछ होगा, की 'वॉल्ट मीटर' (volt meter) से 'मेजर' (measure) अगर करेंगे, मेरा 'मेजर' करेंगे, तो मेरा 'जीरो वॉल्ट' होगा. एक बात याद रखिये, आपके चैनल' (channel) में मैंने पहले ही बताया, जब इंसान का 'वोल्टेज जीरो' होता है, तब हमारी 'इम्युनिटी' (immunity) सबसे अच्छी काम करती है. और 'जीरो' होने का एक तरीका है, जैसे आप जूते उतारेंगे, और पैर जमीन पे रखेंगे, तो धरती से आप 'कनेक्ट' (connect)
पड़ेंगे, क्योंकि मेरे चप्पल से सीधा 'कनेक्शन' (connection) है, वो 'कनेक्शन' कैसे है? वो मैं आपको थोड़ा दिखाता हूँ. आप देखिए, इसको मैं उतारूंगा अगर, 'कनेक्शन' दिखाने के लिए, तो यहाँ पे 'कॉपर' (copper) का एक तार है, एक कील है, और उस कील से ये जो देख रहे हैं, ये 'टिन प्लेटेड कॉपर वायर (Tin plated copper wire) है, जी इसमें पूरा बंधा हुआ है, जब मैं इसको पहनता हूँ ना, तो ये तार मेरे 'स्किन' (skin) से 'टच' (touch) होता है, तो स्किन के माध्यम से, और इस तार के माध्यम से, मैं 'ग्राउंडेड' (grounded) हैं 'ऑलरेडी अर्थ' (already earth) हूँ. तो एक और खासियत है इस चप्पल की, ये सभी के लिए 'वन साइज' (one size) है, क्योंकि ये जो 'स्ट्रिप' (strip) दिख रहे हैं, ये 'सिंगल स्ट्रिप' (single strip) है, इससे 'साइज चेंज' (size change) कर सकते हैं, इंसान के पैर के साइज' के हिसाब से, उसको छोटा बड़ा किया जा सकता है.
Why/How to use
Zero Volt
Sandal?
डॉ. बीआरसी
अनुवादः नाज्ञड्यिा परवीन
बिस्किट यानी विष की किट
https://www.instagram.com/reel/DJq7xTCTUNo/?igsh=ZDcxZ24zZ2FhenFs
देखो हम भारती बने ही 'स्कैम' (scam) के लिए हैं, मतलब बताओ एक छोटा सा 'क्रीम' (cream) वाला 'बिस्किट' (biscuit) तक हमारे साथ 'स्कैम' कर गया था. मतलब जिन 'क्रीम' वाले 'बिस्किट' को हम लोग 'क्रीम' समझ के खा रहे
थे, वो 'क्रीम' होती ही नहीं, बल्कि वो तो 'हाइड्रोजेनेटेड फैट' (hydrogenated fat), या फिर कहूं तो, तेल, उसमें चीनी, उसके अलावा 'प्रिजर्वेटिव' (preservative), और थोड़े से 'फ्लेवर' (flavor), बस ये होता है इसमें
दूध, 'क्रीम' जैसा कुछ नहीं होता, ये पूरा 'ट्रांस फैट' (trans fat) है. 'बाईचान्स' (by chance) तुम ज्यादा खा लो, तो तुम्हारी 'आर्टरीज' (arteries) तक 'ब्लॉक' (block) हो जाएगी. कितनी अच्छी बात है ना, भेज दो ये 'वीडियो' अपने सारे जान पहचान वालों को, मतलब जो खा रहे हो, पता भी तो होना चाहिए क्या खा रहे हो
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